बादलियों आंखडल्यां में बरस्यो, आंखडल्या में बरस्यो गण बाड़ी खिल ज्यावैला, ओ संतां। मुरझ्योडो ओ मनड़ो हरस्यो, ओ मनड़ों हरस्यो, अनुशासन मिल ज्यावैला, ओ संता ॥
तपस्या री जोत ले-र देह न सुकाई है, नदियों री ताती रेत शीतल बणाई है। इन्द्रासन हिल ज्यावैला, ओ संतां ॥१॥
विनती रा बोल सुणो ऊभां हां म्हे सामने, ओ कांइ वनवास रो आदेश मिल्यो राम नै। छमता के छिप ज्यावैला, ओ संतां ॥2॥
थे हो बुद्धिमान थां में ज्ञान रो उजास है, थारै ऊपर देखो म्हांरी पूरो विश्वास है। कुण दूजो दिल आवेला, ओ संतां ॥3॥
थां स्यूं म्हांने आगे और घणी-धणी आस है, देखो आं कंठा में आज कित्ती-कित्ती प्यास है, कुण इमरत बरसावैला ओ संतां ॥4॥
छोड़ो आप अबै ई तपस्या ने म्हारे वास्ते, लोगों धरो कल्याण हुवै लागो उण रासते। जबरी जागृति आवैला, ओ संतां
गहरे पाणी पेठ के विचारी सुरुवात ने, भावी भारी लाभ सिकारी सारी बात ने गांठा से खुल ज्यावैला, ओ संतां ॥० ॥
हुई धर्मक्रान्ति आग्यो चेतना में चानणो, बड़ा-बड़ा ढिचाला ने पड़यो लोहो मानणो। इचरज सबने आवेला, ओ संतां ॥7॥
पढ़ायो ओ पाठ पैलो रह्यो एक डोर में, प्राण स्यू भी ऊंचो प्रण, सोच्यो भौर-भोर में। सुजस अमर बण ज्यावैला, ओ संतां ॥8॥
थिरपाल कतै आज तेरापंथ संघ मैं, हरस हुलास आज म्हारे अंग-अंग में।
‘तुलसी’ मोद मनावैला, ओ संतां ॥
महाप्रज्ञ मोद मनावैला, ओ संतां
वसुगढ़ में रंग छावैला, ओ सतां ॥
मर्यादा मन भावैला, ओ संतों ।
मोच्छव सदा रचावैला, ओ संतां ॥9॥
(लय-रुं रुं में सांवरियो बसियो)