Jain Tirthankaras (जैन तीर्थंकर)

Mahavir Swami

Baje Kundal Pur Me Badhayi

बाजे कुण्डलपुर में बधाई बाजे कुण्डलपुर में बधाई, कि नगरी में वीर जन्मे-2, महावीरजी। जागे भाग्य हैं त्रिशाला माँ के 2 कि त्रिभुवन के नाथ जन्मे 2, महावीरजी ।। शुभ घड़ी जन्म की आई 2, कि स्वर्ग से देव आये, महावीरजी। तेरा न्हावण करे मेरू पर 2, कि इन्द्र जल भर लाये, महावीरजी ।। तुझे […]

Mahavir Swami

Jhule Palane Me Jhule

श्री महावीर स्तवन झूले, पलने झूले  (तर्ज बच्चे मन के सच्चे ….. दो कलियाँ) झूले, पलने झूले, सारे जग के तारण हारे। इन्द्र इन्द्राणी हर्ष मनाये, आकर द्वार तुम्हारे ।। झूले चेत सुदी तेरस का दिन, हर्षित मात-पिता सब जन। चारों दिशी मंगल छाया, सबने सुर सरगम पाया ।। देव दुंदुभि बजने लगी, छुम छुम

Mahavir Swami

Hum Vinay Sunane Aaye Mahavir

महावीर तुम्हारे चरणों में  (तर्ज दिल लूटने वाले जादूगर … मदारी) हम विनय सुनाने आये हैं, महावीर तुम्हारे चरणों में।  मन सुमन चढ़ाने आये हैं, महावीर तुम्हारे चरणों में ।। तुम ज्योतिपुंज तुम दया निधि, हम दीन हीन संसारी हैं। दुःख पीड़ित 2 हैं हम पड़े हुए, महावीर तुम्हारे चरणों में ।।। ।। हम विनय

Mahavir

Hum Vinay Sunane Aaye Hai 2chohbisi3. Kabhi Vir Ban Ke Mahavir Ban Ke

हम विनय सुनाने आये है (तर्ज दिल लूटने वाले जादूगर … मदारी) हम विनय सुनाने आये हैं, महावीर तुम्हारे चरणों में।  मन सुमन चढ़ाने आये हैं, महावीर तुम्हारे चरणों में ।। तुम ज्योतिपुंज तुम दया निधि, हम दीन हीन संसारी हैं। दुःख पीड़ित 2 हैं हम पड़े हुए, महावीर तुम्हारे चरणों में।।1।। हम विनय सुनाने

Mallinath

19. Unnis Ve Tirthankar Bhagwan Mallinath Ki Kahani

19ve Tirthankar Bhagwan Shree Malli Nath Ka Symbol ( Pratik)-Kalash भगवान् श्री मल्लिनाथ तीर्थकर गोत्र का बंध उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ प्रभु स्वयं में एक आश्चर्य ये। शेष तीर्थंकरों ने पुरुष शरीर धारण किया था। किन्तु तीर्थंकर मल्लिनाथ ने स्त्री शरीर में जन्म लिया था। स्त्री-शरीर में इतना आत्म-विकास तथा इतना पुरुषार्थ स्वयं में एक आश्चर्य

Adinath, Rishabh Dev

1. PrathamJain TirthankarBhagwan Shree Rishabh Dev Ki Kahani

1st Tirthankar Bhagwan Shree Rishbhnath Ka Symbol (Pratik)-Bull जैन काल गणना में एक काल-चक्र बीस करोड़ा-करोड़ सागरोपम का होता है। काल-चक्र के उत्सर्पिणी तथाअवसर्पिणी नाम से दो विभाग हैं, प्रत्येक विभाग दस-दस करोड़ा करोड़ सागपरोपम का है। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के छः-छः विभाग होते हैं। उन्हें आगम की भाषा में ‘आरा’ कहते-हैं। उत्सर्पिणी काल के

Ajit Nath

2. Second (Dusre)Tirthankar Bhagwan Shree Ajit Nath Ki Kahani

2ndTirthankar Bhagwan Shree Ajit Nath Ka Symbol ( Pratik)-Elephant  दूसरे तीर्थंकर भगवान अजित नाथ  जैन दर्शन का विश्वास आत्मवाद में है ,आत्मा अपनी सत क्रिया से कम कर्म मुक्त होकर परमात्मा बनती है. जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर भगवान अजीत नाथ है, अजीत नाथ ने भी अपने पूर्व जन्म में घोर तपस्या की थी ,सम्राट

Abhinanandn

4. Forth (chothe) Tirthankar Bhagwan Shree Abhinanandn Ki Kahani

4rth Tirthankar Bhagwan Shree Abhinanandn Ka Symbol (Pratik)(Monkey) भगवान् श्री अभिनन्दन तीर्थंकर गोत्र का बंध महाबल के भव में भगवान् अभिनन्दन का जीव भौतिकता के प्रति सर्वथा उदासीन रहता था। राज्य सत्ता व युवावस्था का जोश भी उन्हें उन्मत्त नहीं बना सका। पिताजी का सौंपा हुआ दायित्व वे निर्लिप्त-भाव से निभाते थे तो संयम के

Chandra Prabhu

8. Aath Ve Tirthankar Bhagwan Shri Chandra Prabhu Ki Kahani

8th Tirthankar Bhagwan Shree Chanda Prabhu Ka Symbol (Pratik) -Crescent Moon) भगवान् श्री चंद्रप्रभ प्रभु तीर्थकर गोत्र का बंध अनेक जन्मों की सत्क्रिया के फलस्वरूप धातकी खंड की मंगलावती नगरी के राजा पद्म के भव में धर्म-प्रेरणा का अच्छा योग मिला था। शहर में साधुओं का आना जाना प्रायः रहता था। धर्म की प्रेरणा सामान्यतः

Anantnath

14. Chawd Ve Tirthankar Bhagwan Anantnath Ki Kahani

14th Tirthankar Bhagwan Shree Anantnath Ka Symbol ( Pratik)- Falcon भगवान् श्री अनन्तनाथ तीर्थकर गोत्र का बंध चौदहवें तीर्थकर अनन्तनाथ अपने पूर्व जन्म में अरिष्टा नगरी के राजा पद्मरथ के रूप में भू-मण्डल में सर्वाधिक वर्चस्वी राजा थे। सब राजाओं पर इनकी धाक थी। पद्मरथ के विरुद्ध संघर्ष की बात तो दूर, विरोध में बोलने

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