महा कठिन है काम तपस्या, कर बाते करना बहुत सरल है, मुश्किल है बलिदान रे ।। स्थायी
तप की महिमा मुक्त कंठ से, गाते शास्त्र मनस्वी,
नहीं भटकता गहन तिमिर में, विजयी दिव्य तपस्वी, मिल जाता, लक्ष्य स्वयं उसको जो, करता अनुसंधान रे…।। 1 ।।
तपे तपस्वी देखो कितने, एक – एक से भारी, धनजी, शालिभद्र, काकंदी, धन्ना की बलिहारी,
हम ध्यायें, अ.भी.रा.शि. को. पीत्थल, गुलजारी गुणगान रे…।।2 ||
काया कल्प सहज जीवन का, शोधन तप के द्वारा,
आधि – व्याधि को दूर भगाता, शुद्ध रसायन पारा,
भव सागर, पार पहुंचाने को है, तप अनुपम जलयान रे…।॥3 ॥
नमन उसी आत्मा को जो तप, संयम में रत रहता,
भूख तृषा के भीष्म परीषह, समता से जो सहता,
हम पायें, ‘मुनि मणि’ तपज्योति से, आत्म सिद्धि सोपान रे…।।4 |
(लय-बड़े प्यार से मिलजुल सीखे)