(लय- धर्म की लौ जलाये हम)
करें हम वीर प्रभु का ध्यान । करुणानिधि ! करुणाकर ! तारो, कर दो अब कल्याण ।।
१. अन्त किया आठों कर्मों का, केवल दीप जलाया, अतिशय धारी, पर उपकारी, सोया शौर्य जगाया ।
अजर अमर अविनाशी तुमने, प्राप्त किया निर्वाण ।।
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२. चौरासी में घूम रहे हम, कोई नहीं सहारा, क्रोध मान की कुटिल चाल से, सारा जग यह हारा ।
पार लगाओ, द्वार दिखाओ, हे प्यारे भगवान !
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३. मैली चादर देख भक्त की, आते मत सकुचाना, मैंने शरण तुम्हारी ले ली, तुमको सब कुछ माना ।
सोया मन जग जाए अब तो, दो ऐसा वरदान ।।
४. जीवन का आदर्श अहिंसा, मैत्रीमय बन जाऊं,
दुश्मन-दोस्त सभी पर मैं तो, करुणा धार बहाऊं ।
दीप ज्योति का भेद रहे ना, तूं मैं एक समान ।।
रचयिता : साध्वी राजीमतीजी