Dhanya Gaj Sukumal Muni Dhyan Dhare

धन्य गजसुकुमाल 
 (लय: सरवर पाणीड़ै ने जाऊं)। 
 रचयिता : आचार्यश्री तुलसी 
धन्य गजसुकुमाल मुनि ध्यान धरै, 
ऊभा अटल श्मशान गुण-ज्ञान भरै।
 ज्ञान भरै अघ शान हरै ।।
१. जिण ही दिन दीक्षा लीन्ही जिनवर नेमी पास, 
उण ही दिन कीन्हों दारुण-साधना-अभ्यास ।
 पडिमा बारवीं भिखू की अंगीकार करें ।।
२. जीवित ही कीन्हो अपण अंग को उत्सर्ग, 
खड़‌यो एक ठोर ठा कठोर कायोत्सर्ग । 
आयो सुसरो सोमिल विप्र पूरब वैर सुमरै ।।
३. वर्ण-ज्येष्ठ बाज की है दुष्टता कमाल, 
सन्त शीष खीरा धरया बांध माटी-पाल । 
चटकै करतो यूं चंडाल या कसाई भी डरै ।।
४. हा। हा। रे पापी। करयो पाप कित्तो घोर ? 
सींग-पूंछ स्थान दाढ़ी-मूंछ वालो ढोर ।
 पायी आ ही है अधिकाई नहिं घास चरै ।।
५. रोम-रोम दाह लागी सन्त कै शरीर, 
तो भी ‘आह-ओह’ शब्द कियो ना सधीर ।
जूझे जोधां ज्यू अडोल वीर-वृत्ति बावरै ।।
६. खधबध-खधबध कर सिर सीझै जाणै खीचड़ो,
 तो भी अंग अविचल है मुकाबलो कड़ो । 
अन्तर-भाव की दृढ़ताई कविजन कल्पना-परै ।।
७. रे रे चेतनिया। तनिया। मत ना हो अधीर, 
तू ही कब ही किण ही रे करी हुसी पीर ?
 आ है सोलह आना साच को ही करे सो भरै ।।
८. ज्यादा-ज्यादा वेदना तो नरकों में सही,
 एक ना अनेक ना अनन्त बार ही। 
त्राही त्राही की पुकार जियड़ा। मतना बिसरै ।।
९. तू है ज्ञानवान ज्ञानशून्य थारो गात, 
गात रै सम्बन्ध स्यूं  ही हुवै थांरी घात ।
 अब तूं बिलकुल रै चुपचाप देही जरै तो जरै ।।
१०. अपणी अत्ता कत्ता है विकत्ता है विचार, 
शत्रु बा ही मित्र वा ही सुख-दुःख री दातार ।
 अपणी आत्मा सुधरै तो सारा काज सुधरै ।।
११. ओ तो है उपकारी माथै बांध माटी पाल,
 कर्म-माल पार करण बण्यो है दलाल । 
मत द्वेष-भाव ल्याई उपकारी उपरै ।।
१२. किंचित भी कंप न तन में होणो चाहीजे, 
आगी का जीव कोई क्यूं पीड़ाईजै ?
 देखै पीर जो पराई बो शिव-वास वरै ।।
१३. चींटी को चटको भी न शान्त सह्यो जाय,
 इस्यै उपसर्ग में तो जुदा जीव काय । 
तब ही ‘तुलसी’ बिना नाव भव-उदधि तरै ।।

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