22.Bais Ve Tirthankar Bhagwan Arishtnemi Ki Kahani

22ve Tirthankar Bhagwan Shree ARISHTNEMI ka Symbol (Pratik)-Conch,(Shankh)

भगवान् श्री अरिष्टनेमि को आज के इतिहासकार भी महापुरुष के रूप में स्वीकार करते हैं। 24 तीर्थंकरों मे इक्कीस को प्रागेतिहासिक काल के मानते हैं। किन्तु, बाइसवे तीर्थंकर श्री अरिष्टनेमी की ऐतिहासिकता के बारे में सब एकमत है।
उनके तीर्थङ्कर गोत्र का बन्ध ,शंख राजा के भव में हुआ था। हस्तिनापुर के राजा श्रीषेण के प्रथम पुत्र के रूप में उनका जन्म हुआ था। शरीर की समुज्ज्वलता देखकर राजा श्रीषेण ने पुत्र का नाम दिया था शंख। राजकुमार शंख क्रमशः बड़े हुए। गुरुकुल में बहत्तर कलाओं का ज्ञान किया।
एकदा सीमावर्ती लोगों ने आकर पुकारा कि महाराज । हम लुट गये। पल्लिपति समरकेतु को शत्रु का सहयोग है, यदि तुरन्त ध्यान नहीं दिया गया तो राज्य तहस-नहस हो जाएगा। सुनकर राजा क्रुद्ध हो उठा। तत्काल सेना को आदेश दिया और स्वयं भी युद्ध के लिए तैयार होने लगे। राजकुमाऱ शंख को जब ज्ञात हुआ तो आग्रहपूर्वक पिता के स्थान पर वे स्वयं चल पड़े। सीमावर्ती क्षेत्र में भयंकर युद्ध हुआ। समरकेतु के अनेक साथी मारे गये। कुछ जान बचाकर भाग गये। समरकेतु स्वयं राजकुमार शंख के सैनिकों में घिर गया था। समर्पण करना पड़ा।    राजकुमार शंख ने लूट का माल भी का  सीमावर्ती लोगों को पुनः लौटा दिया।
पल्लिपति समरकेतु को पकड़ कर विजयी राजकुनार वापस हस्तिनापुर आ रहे थे, सह‌सा उन्हें जंगल में विद्याधर मणिशेखर मिला। राजकुमार को देखते हो  भागने को कोशिश करने लगा। अवसर देखकर रोती हुई यशोमति ने राजकुमार को अपने अपहरण की दारुण घटना सुनाई तथा मणिशेखर से बचाने की प्रार्थना की।
राजकुमार शंख ने मणिशेखर को समझाया और न मानने पर युद्ध प्रारंभ कर दिया। मणिशेखर युद्ध में पराजित होकर भाग गया। राजकुमारी यशोमति राजकुमार शंख के अद्भुत शौर्य से अत्यधिक प्रभावित हुई। इतने में उसके पिता जितारि भी उसकी खोज करते-करते वहां पहुंच गये। सारी बात सुनकर वे अत्यधिक प्रसन्न हुए तथा कन्या की इच्छा देखकर राजकुमार शंख के साथ जंगल में ही उनका विवाह कर दिया।
राजा श्रीषेण  पुत्र  के शोर्य को महिमा सुनकर  अत्यधिक प्रसन्न हुए। योग्य देखकर उसी उत्सव में पुत्र का राज्याभिषेक किया, और स्वयं अणगार बनकर 
उत्कृष्ट साधना में लगे । कुछ वर्षों में उन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया ।
राजा शंख कुशलता से राज्य चलाते रहे । एक बार शहर से दूर जंगल में बने उद्यान में वे सपत्नी क्रीड़ा करने गये । अनेक मित्र व अनुचर भी उनके साथ में थे। वहीं भोजन तैयार हुआ । शंख बैठे हुए आमोद-प्रमोद की बातें कर रहे थे । इतने में प्यास से व्याकुल एक मुनि आए । शंख ने मुनि को देखते ही खड़े होकर वंदना की। रानी यशोमती भी मुनि को देखकर भाव-विभोर हो रही थी। मुनि ने पानी के लिए हाथ से संकेत किया, राजा-रानी समझ तो गये कि मुनि को गहरी प्यास है, किन्तु अपने यहां उचित पानी कहां से आये, वे सोच रहे थे । तभी रानी यशोमती को याद आया कि रायते में डालने के लिए
दाखें (किशमिश) भिगोई हुई हैं, उसका पानी अचित्त है, अगर गिराया नहीं होगा तो काम आ जाएगा। तत्काल वह रसोई की तरफ गई देखा तो टोकने में पानी पड़ा था। मुनि को निवेदन किया। शुद्ध जानकर मुनि बहरने लगे। राजा शंख व रानी यशोमती ने बर्तन के दोनों ओर के कड़े पकड़ कर साथ में ही मुनि को जल बहाया। जंगल में ऐसा योग मिलने से राजा-रानी दोनों हर्ष-विभोर हो रहे थे। उन बढ़ते परिणामों में राजा ने तीर्थकर गोत्र का बंध किया। रानी ने स्वयं को एका-भवतारी (एक भव के अनन्तर मोक्ष जाने वाली) बना लिया। अगले जन्म में महासती राजीमती के रूप में यशोमति ने ही जन्म लिया था।
कालान्तर में पुत्र को राज्य सौंपकर राजा-रानी दोनों ने आचार्य श्रीषेण के पास दीक्षित होकर उत्कृष्ट तपस्या और साधना की। संचित कर्मों को हल्का कर वे दोनों पंडित मृत्यु पाकर वैजयंत विमान में महर्धिक देव बने ।
जन्म
सुदीर्घ देवायु को भोगकर शौरीपुर नगर के सम्राट् समुद्र-विजय की महारानी शिवारानी की कुक्षि में अवतरित हुए। महारानी शिवा ने चौदह स्वप्न देखे । स्वप्न पाठकों ने कालगणना व स्वप्न-शास्त्र के आधार पर तीर्थङ्कर होने की भविष्यवाणी की ।  सावधानीपूर्वक गर्भ की वृद्धि होने लगी ।
गर्भकाल पूरा होने पर श्रावण शुक्ला पंचमी की मध्य रात्रि की शुभ वेला में भगवान् का जन्म हुआ। देवेन्द्रों ने उत्सव किया। महारानी शिवा पुत्र प्राप्ति से स्वयं को कृतकृत्य मान रही थी। राजा समुद्रविजय ने अपने दस भाइयों के साथ अपूर्वजन्मोत्सव किया।
 नाम की चर्चा में राजा समुद्रविजय ने कहा-बालक के गर्भ में आने के बाद राज्य सब प्रकार के अरिष्ट से बचा रहा है। इसकी माता को अरिष्ट रत्नमयचक्र (नेमि) का स्वप्न आया था, अतः बालक का नाम अरिष्टनेमि ही रखा जाए । उपस्थित जन-समूह ने उन्हें इसी नाम से पुकारा ।
बासुदेव कृष्ण और भगवान् नेमि
जैन इतिहास में वासुदेव कृष्ण तथा भगवान् अरिष्ट नेमि, दोनों को चचेरे भाई बतलाया है। भगवान् अरिष्टनेमि समुद्रविजय के पुत्र थे और बासुदेव कृष्ण वसुदेव के । समुद्रविजय व वसुदेव सगे भाई थे। समुद्रविजय वैसे दस भाई थे। उनमें सबसे बड़े समुद्रविजय सबसे छोटे वसुदेव थे । वासुदेव कृष्ण और बलराम का जन्म पहले हो चुका था। बलराम राजप्रासाद में थे और वासुदेव कृष्ण गोकुल में नन्द के घर बड़े हो रहे थे। भगवान् नेमि के जन्म के बाद ही कंस वध हुआ। द्वारिका का निर्माण हुआ । जरासंघ के युद्ध में तो भगवान् नेमिकुमार ने अपूर्व शौर्य से सेना की रक्षा की थी। वासुदेव कृष्ण और तीर्थंकर नेमिनाथ का जीवन एक-दूसरे के जीवन से इतने संयुक्त हैं कि दोनों को अलग कर पाना जीवन चरित्रों को अपूर्ण बनाना है।
जरासंध के युद्ध में
भगवान् नैमि व वासुदेव कृष्ण के बचपन का काल राज-नैतिक दृष्टि से बहुत ही विचित्र था। चारों ओर धोंस-दबाव की राजनीति चल रही थी। लाठी की राजनीति नै सर्वत्र अव्यवस्था फैला रखी थी। तभी तो वासुदेव कृष्ण को अनेक युद्ध करने पड़े। गलत व्यक्तियों को सबक सिखाना पड़ा। कंस-बध के बाद द्वारिका का निर्माण हुआ। उसके बाद जरासंध के साथ निर्णायक युद्ध हुआ। उसमें भगवान् अरिष्टनेमि। भ्रातृत्स्नेह के कारण यादव सेना में जाने को तैयार हुए। तब शक्रेन्द्र महाराज ने मातलि सारथी युक्त शस्त्रास्त्रों से सज्जित रथ नैमिकुमार के लिये भेजा ।
युद्ध में अनेक योद्धा काम आये। एक बार तो प्रबल पराक्रमी जरासंध ने हाहाकार ही मचा दिया था । यादव सेना भी हतप्रभ हो गई थी।
अवसर देखकर नैमिकुमार ने युद्ध की बागडोर अपने हाथ में ली। रथ पर आरूढ़ होकर स्वयं रण-स्थल में आये । बाणों की बौछार करते हुए उन्होंने जरासंध की सेना को एकदम पीछे की ओर धकेल दिया। यादव सेना सहसा गरज उठी ।  नैमिकुमार की सिंह गर्जना से उसके सैनिकों के हाथों से हथियार गिर चुके थे।.
अन्त में वासुदेव कृष्ण ने प्रतिवासुदेव जरासंध की सुदर्शन चक्र से हत्या कर अपने जीवन की ऐतिहासिक विजय प्राप्त की।
अपरिमित बल
एक बार नेमिकुमार घूमते-घूमते वासुदेव कृष्ण के शस्त्रा-गार में जा पहुंचे । अवलोकन करते हुए उन्होंने वहां पांचजन्य शंख देखा । कौतूहलवश वे उसे उठाकर बजाने लग गये । शंख के गम्भीर घोष से सारी द्वारिका दहल उठी। अनेक लोग मुर्छित हो गये। वासुदेव कृष्ण और बलभद्र भी तत्काल शस्त्रागार की तरफ दौड़े। सोचने लगे यह दूसरा बासुदेव कहां से आ गया ? क्या हमारी स्थिति समाप्त हो रही है ? अथवा हम अब वासुदेव बलदेव नहीं रहे हैं? आयुध-शाला में पहुंच कर उन्होंने देखा तो पाया कि नेमिकुमार वहां घूम रहे थे। शस्त्र-संरक्षक से ज्ञात हुआ कि शंख नैमिकुमार ने बजाया था।
वासुदेव कृष्ण का मन संशयशोल हो गया, सोचने लगे-पांचजन्य शंख जिसे वासुदेव ही बजा सकता है, मेरे अग्रज बलराम भी उसे नहीं बजा पाते, उस शंख को इतनी प्रखरता से बजा देना तो सचमुच अद्भुत पराक्रम का काम है। किसी दिन यदि नेमि के मन में राज्य प्राप्ति की भावना जाग गई तो मैं इसे दबा नहीं सकू गा। फिर भी मुझे पता लगाना चाहिए. कि वास्तव में शक्ति मुझ में अधिक है या इनमें।
दो चार दिन बाद वासुदेव कृष्ण ने अरिष्टनेमि से कहा-हम मल्ल-शाला में बाहु नमन प्रतियोगिता करें, देखें कौन किसकी भुजा को नमाता है ! नेमिकुमार की स्वीकृति पाकर दोनों मल्ल-शाला में गये। अनेक यादव प्रतियोगिता देखने एकत्र हो गये। पहले श्री कृष्ण वासुदेव ने अपनी दाहिनी भुजा फैलाकर सामने कर दी। नेमिकुमार ने सहज मुस्कान के साथ बायें हाथ से हरे वृक्ष की टहनों को तरह उसे पकड़ कर बिना किसी श्रम के झुका दी। यह देख सब विस्मित हो उठे ।
इसके पश्चात् श्री कृष्ण के आह्वान पर नेमिकुमार ने अपनी सुदृढ़ भुजा सामने की। वासुदेव कृष्ण ने पहले बायें हाथ से भुजा को झुकाने का प्रयत्न किया, किन्तु असफल रहे।
फिर दायें हाथ से प्रयत्न किया, फिर भी वह नहीं झुकी। तब दोनों हाथों से पकड़ कर उन्होंने जोर लगाया। उधर नेमि-कुमार ने भुजा को कुछ और ऊंचा कर दिया तो श्री कृष्णा उस पर झूलने लगे। चारों ओर नैमिकुमार के बल की प्रशंसा होने लगी । कृष्ण ने नेमिकुमार को छाती के लगाकर कहा-ऐसा बलिष्ठ मेरा अनुज है, फिर मेरे राज्य पर कौन अंगुली उठा सकता है ? मुझे गर्व है, अपने भाई पर ।
महल में आने पर श्रीकृष्ण के मन में आया नेमिकुमार अभी विवाहित नहीं है, अतः मुझे से अधिक ताकतवर है। अच्छा हो, इसे विवाह के फन्दे में डाल दूं। स्त्रियों के जाल में फंसने के बाद न इसमें इतनी ताकत रहेगी और न राजा बनने की धुन उपजेगी। अब तक तो सर्वथा वासना मुक्त है। इसे किसी न किसी तरह विवाह के लिए तैयार किया जाए।  कृष्ण ने यह कार्य अपनी रानियों को सौंपा तथा क्रीड़ा का आयोजन किया ।
महारानी रुक्मिणी, सत्यभामा आदि अनेक रानियों ने नेमिकुमार से कहा- देवर जी ! तुम्हारे साथ जल क्रीड़ा करने की अभिलाषा है, भाभियों का मन तो रखना ही होगा । भाभियों के आग्रह को नेमिकुमार टाल नहीं सके। सरोवर में भाभियों के साथ वे काफी समय तक खेलते रहे। खेत-खेल में रुक्मिणी आदि रानियों ने आग्रह किया-तुम्हें विवाह करना होगा। यादव वंश के कुल-मणि होकर कुंवारे फिरते हो, सबको लज्जा आती है। कुलीन लड़के समय पर विवाह कर लेते हैं, हमें भी देवरानी चाहिये। बोलो, स्वीकार है न हमारा प्रस्ताव ?
नेमिकुमार मुस्कराते हुए भाभियों के आग्रह को सुन रहे
थे। अवसर देखकर कृष्ण भी बोले अनुज ! भाभियों की मनुहार व हम अग्रजों का मन कभी ठुकराना नहीं चाहिए।
भगवान् नैमिकुमार ने अवधिज्ञान से देख लिया था कि विवाह की तैयारी ही मेरी दीक्षा का निमित्त बनेगी । फिर इन्कार क्यों करू ? मनुहार करते हुए कृष्ण महाराज ने और रानियों ने पूछा, “क्यों, तैयारी करें?” नेमिकुमार ने कहा-हो । विवाह की स्वीकृति मिलते ही चारों ओर प्रसन्नता छा गई। वासुदेव कृष्ण अनेक राजकन्याओं के बारे में सोचने लगे । महारानी सत्यभामा ने कहा मेरी छोटी बहिन राजीमती नैमिकुमार के लिए सर्वथा उपयुक्त है। श्री कृष्ण को यह प्रस्ताव उचित लगा। तत्काल उग्रसेन राजा से पुत्री की याचना की गई। उग्रसेन ने कहा- मेरा सौभाग्य है, मेरी एक पुत्री पहले ही आपके महल में है, अब दूसरी भी वहां नेमिकुमार की जीवन संगिनी बनेगी। किन्तु, मेरे यहां आपको बारात लेकर आना होगा। मैं वहां आकर अपनी लड़की नहीं दूंगा।
कृष्ण महाराज शीघ्रता से विवाह की तैयारी करने लगे । उन्हें भय था, कहीं नेमिकुमार नकार न जाए। इस भय से चातुर्मास में ही श्रावण शुक्ला छठ की निश्चित तिथि पर धूम-धाम से नेमिकुमार को सुसज्जित रथ में बिठा कर समुद्रविजय आदि दस दसार-श्रीकृष्ण, बलरामजी, दृढ़नेमि तथा रथनेमि आदि अनेक यादवकुमार हाथी, घोड़े तथा रथों में बैठकर रवाना हो गए।
उधर उग्रसेन राजा ने पूरी तैयारी कर रखी थी। विभिन्न पकवानों के साथ सैंकड़ों-हजारों पशुओं को भी एकत्रित कर रखा था। नैमिकुमार की बारात उन संत्रस्त पशुओं के बाड़ो के बीच में से गुजरी। भयभीत पशुओं की देखकर नेमिकुमार ने सारथि से पूछा- इन पशुओं को क्यों रोक रखा है? सारथि ने नम्रता से निवेदन किया- राजकुमार। यह सब आपके लिये हैं। आपके साथ आये यादव-कुमारों को इनका मांस परोसा जायेगा।
नैमिकुमार का हृदय करुणा से भर उठा। वे सोचने लगे-एक मेरा विवाह होगा, और हजारों मूक पशुओं के प्राण लूटे जायेंगे। उनकी मौत का निमित्त बनुगां मै। नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता। मुझे विवाह नहीं करना है। उन्होंने सारथी से कहा-रथ को वापिस द्वारिका की तरफ मोड़ दो। सारथी ने रथ को मोड़ दिया। नेमिकुमार ने प्रसन्नमना शरीर पर से सारे आभूषण उत्तार कर रथिक को दे दिये।
नैमिकुमार का रथ मुड़ा, बारात की सारी व्यवस्था लड़ खड़ा गयी । कृष्ण व बलरामजी आदि सभी ने आकर पुनः समझाया-नेमिकुमार दृढ़ता से इन्कार होकर द्वारिका आ गए और वर्षीदान दिया।
अभिनिष्क्रमण यात्रा
भगवान् नैमिकुमार की विरक्ति से सब विस्मित थे। परम सुन्दरी राजीमती जैसी युवती को बिना शादी किये ही छोड़ देना प्रबल आत्मबल का कार्य था। अनेक युवकों ने भी उनकी विरक्ति से स्वयं विरक्त हो कर तत्काल नेमिकुमार के साथ दीक्षित होने की घोषणा कर दी थी।
निश्चित तिथि श्रावण शुक्ला छठ को उत्तर-कुरु नामक शिविका में बैठकर उज्जयंत (रेवतगिरि) पर्वत पर सहस्रान उद्यान में आये। प्रभु की निष्क्रमण यात्रा में अपार मानव- मेदिनी और चौसठ इन्द्रों के साथ अनगिनत देवगण सम्मिलित हुए। शोभा-यात्रा में सनत्कुमारेन्द्र प्रभु पर छत्र करते हुए चलने लगे। शकेन्द्र और ईशानेन्द्र समुज्ज्वल चंवर बीजते हुए शनैः शनैः कदम उठा रहे थे। माहेन्द्र हाथ में खड्ग, ब्रह्मैद्र दर्पण, सांतकेन्द्र पूर्णकलश शक्रेन्द्र स्वस्तिक लेकर तथा सहस्रारेन्द्र दिव्य धनुष्य चढ़ाकर आगे-आगे बढ़ रहे थे। प्राण-तेन्द्र श्रीवत्स तथा अच्युतेन्द्र नंद्यावर्त धारण किये हुए यात्रा को मंगलमय बना रहे थे। शेष चमरादि इन्द्र अपने-अपने आयुधों से सुसज्जित हो अपनी-अपनी पंक्ति का नेतृत्व कर रहे थे।
सहस्रात्र उद्यान में पहुंच कर अशोक वृक्ष के नीचे भगवान् ने शेष आभूषण उतारे और पंच-मुष्टि लोच किया। वासुदेव श्री कृष्ण ने अवस्था में बड़े होने के कारण लुंचितकेश नेमिकुमार को आशीर्वाद देते हुए कहा है दमीश्वर ! आप शीघ्रातिशीघ्र अपने लक्ष्य को प्राप्त करें, धर्म का आलोक विश्व में फैलाएं ।
भगवान् नैमिकुमार ने एक हजार विरक्त व्यक्तियों के साथ प्रवज्या ग्रहण की। वासुदेव श्रीकृष्ण आदि सब उन्हें वंदना कर अपने महलों में लौट आये। दीक्षा के दिन भगवान् के अष्टम भक्त (तेला) था। दूसरे दिन वरदत्त ब्राह्मण के यहां परमान्न से आपका पारणा हुआ। देवों ने पंच द्रव्य’ प्रकट किए। लोगों को सर्वत्र पता लग गया कि आज वरदत्त के यहां नैमिकुमार का पारणा हुआ है।
१. दिव्य ध्वनि, सुगंधित जल, पुष्प, दिव्य वस्त्र, स्वर्णमुद्राएं ।
केवल ज्ञान
भगवान् नैमिनाथ की दीक्षा के बाद चौपन रात्रियां छद् मस्थ अवस्था में बीतीं। उत्कृष्ट विरक्ति से ध्यान के विविध आलम्बनों के द्वारा आत्मलीन होकर महान् कर्मनिर्जरा की। एकदा आप पुनः उज्जयंत (रेवतगिरि) पर्वत पर पधारे। उनी रात्रि में आपने क्षपक श्रेणी लेकर केवल ज्ञान प्राप्त किया।
देवों ने उत्सव कर समवशरण की रचना की। द्वारिका के नागरिक भगवान् के सर्वज्ञ बनने की बात सुनकर हर्षविभोर हो उठे। वासुदेव कृष्ण सहित सभी उत्सुक लोगों ने रेवतगिरि पर भगवान् के दर्शन किये । महासती राजीमती भी भगवान् के दर्शनार्थ वहां पहुंच गई। प्रभु के प्रथम प्रवचन में तीर्थ पहले ही स्थापित हो चुका था। वरदत्त बादि अनेकों संयमोत्सुक व्यक्तियों तथा यक्षिणी आदि अनेकों विरक्त महिलाओं ने संयम धारण कर लिया। समुद्रविजय आदि अनेक राजाओं और शिवादेवी, देवकी, रोहिणी आदि रानियों ने श्रावक धर्म स्वीकार किया ।
बाद में श्रीकृष्ण से पूछ कर राजीमती आदि अनेक युव तियों ने भी संयम की कठोर साधना स्वीकार की।
गजसुकुमाल को मुक्ति
नेमिनाथ के शासन में दीक्षित अनेकों मुनि बेले-बेले व तेले-तेले का तप करते थे। उनमें भद्दिलपुर की सुलसा गाथा-पत्नी के छः पुत्र भगवान् के चरणों में बेले-वेले तप करते हुए साधना कर रहे थे। एकदा बेले के पारणे में वे पट्-ऋषि दो-दो मुनियों के संघाटक के रूप में भिक्षार्थ द्वारिका में प्रवेश 
किया । घूमते-घूमते वे वासुदेव के राज-प्रसाद में देवकी के महल में आए। देवकी ने भावपूर्वक मुनि युगल को शुद्ध भोजन प्रदान किया। भोजन लेकर मुनि लौट पड़े ।
देवकी विस्मित नेत्रों से मुनि के तेजस्वी शरीर को देखने लगी। दो-चार क्षणों में दूसरा मुनि-युगल पहुंच गया, उन्हें भी भिक्षा दी। उसके बाद तीसरा युगल भी वहां आ पहुंचा। देवकी ने उन्हें भी भक्तिपूर्वक दान प्रदान किया। तीसरा मुनि-युगल भिक्षा लेकर चला गया। देवकी सोचने लगी क्या द्वारिका नगरी में अन्यत्र कहीं भी भोजन उपलब्ध नहीं हुआ ? तब ही मेरे घर पर मुनि तीन बार भिक्षा के लिए पधारे हैं ? सचमुच द्वारिका में मुनियों को आहार नहीं मिल रहा होगा ! प्रभु से पूछ कर निर्णय करूंगी।
देवकी ने प्रभु के पास आकर पूछा- प्रभो ! मेरा तो अहोभाग्य है कि आज मेरे घर पर तीन बार मुनि युगल पधारे। किन्तु द्वारिका में वैसे दान देने की भावना तो विद्य-मान है न ? साधुओं को शुद्ध आहार का योग तो मिलता है न ? सुनकर प्रभु मुस्कराये । सहज मुद्रा में कहा-नहीं देवकी ! ऐसी बात नहीं है। तीन बार आने वाले वह एक युगल नहीं अलग-अलग थे। सुनकर देवकी चौंक पड़ी । पुनः पूछा- प्रभो ! वे एक जैसे ही तो थे !
प्रभु बोले हां, देवकी! ये सहोदर भाई हैं। रूप-रंग व संस्थान में सर्वथा समान हैं। देवकी- भगवान् ! इन कामदेव जैसे दिव्य-रूप के धारक पुत्रों को किस माता ने जन्म दिया ? प्रभु-देवकी ! इनकी माता तो तुम्हीं हो। विस्मिंत देवकी को प्रभु ने मृत पुत्रों की सारी बात सुनाई
देव-भक्ति से प्रसन्न हरिणेगमेषी देवता का कतृत्व विस्तार से बताते हुए कहा- ये तुम्हारे ही अंगजात हैं। बड़े हुए हैं भद्दिलपुर में नाग गाथापति की पत्नी सुलसा की गोद में। प्रभु ने छहों मुनियों को उपस्थित होने का निर्देश किया ।
एक जैसे छहों पुत्रों पर अपूर्व वात्सल्य देवकी के हृदय में उमड़ पड़ा। स्तनों से दूध की धारा बह चली । अनिमेष नेत्रों से बह उन मुनियों को देखने लगी। बात सुनकर वासुदेव श्रीकृष्ण, श्रीबलरामजी, आदि पारिवारिक लोग भी आ गये। कृष्ण अपने अग्रजों को देखकर भाव-विह्वल हो उठे। अन्त में वन्दन कर सब वापस चले गए। किन्तु देवकी उदास रहने लगी । सात पुत्रों को जन्म देकर भी मैंने एक को भी दूध नहीं पिलाया, गोद में नहीं खिलाया, अपना वात्सल्य नहीं दिया, फिर क्या है, मां बनने में ? इसी चिन्तन में वह रात-दिन अनमनी सी रहने लगी ।
कृष्ण  महाराज ने जब अपनी माता से उदासीनता का कारण पूछा तो देवकी की आंखों से अश्रुधारा वह चली । गद्गद् स्वर में अपनी मनोव्यथा सुनाती हुई बोली- कृष्ण ! सात-सात दिग्गज पुत्रों को जन्म देकर एक को भी मैंने दूध नहीं पिलाया, गोद में नहीं खिलाया। एक पुत्र को भी यदि बाल-क्रीड़ा करवा देती तो मन में खटक नहीं रहती । कृष्ण महाराज तत्काल उठ कर पौषध शाला में आये, अट्टम (तीन दिनों का तेला) तप करके कुल देव को याद किया। देव के प्रकट होने पर कृष्ण ने पूछा- मेरे छोटा भाई होगा या नहीं ? देव ने अपने दिव्य ज्ञान से देख कर कहा- तुम्हारे एक भाई और होगा, किन्तु बचपन में ही दीक्षित हो जायेगा । कृष्ण वासुदेव ने देवकी के पास आकर यह शुभ सूचना दी । स्वर्ग से एक और जीव आपकी कुक्षि से उत्पन्न होगा। इस प्रकार हम सात नहीं, आठ भाई हो जायेंगे । सुनकर देवकी अत्यधिक प्रसन्न हुई ।
कुछ समय पश्चात् देवकी के एक पुत्र का जन्म हुआ । वासुदेव कृष्ण ने अपने भाई का जन्मोत्सव विशेष रूप से मनाया। हाथी के तलुवे के समान सुकोमल शरीर वाला होने के कारण भाई का नाम गजसुकुमाल रखा गया ।
कुछ वर्ष बीते । गजसुकुमाल समझदार हो गये । बचपन में भी वे बड़े चतुर थे । एकदा विचरते-विचरते भगवान् नेमिनाथ वहां पधारे । वासुदेव श्रीकृष्ण के साथ राजकुमार गजसुकुमाल भी दर्शनार्थ आये । प्रवचन सुना  संसार से विरक्त हो गया। प्रभु के चरणों में मुनि-व्रत ग्रहण कर लिया ।
गजसुकुमाल ने  जिस दिन दीक्षा ली इसी दिन प्रभु की आज्ञा से महाकाल श्मशान में जाकर ध्यानारूढ़ हो गये। शरीर और आत्मा की भिन्नता पर इतने गहरे उतर गये कि उन्हें शरीर का भान ही नहीं रहा । 
महान् उपसर्ग
गजसुकुमाल मुनि ध्यान निमग्न थे। उधर सौमिल नामक विप्र यज्ञ की समिधा (लकड़ी) आदि लेकर आ रहा था । सहसा उसकी दृष्टि मुनि पर पड़ी। देखते ही वह आग-बबूला हो उठा। मन ही मन कहने लगा- अरे मूढ़ ! साधु ही बनना था, तो फिर मेरी लड़की को कुंआरी ही अंतःपुर में क्यों रखा ? उस बेचारी का जीवन ही बर्बाद कर दिया ।ऐसे ही तो राजीमती को भी अन्त में साध्वी बनना पड़ा था ।
तूं तो भिक्षु बन गया, किन्तु वह क्या करेगी? इस चिन्तन में उसका क्रोध और अधिक हो गया। उसने मुनि के मस्तक पर गीली मिट्टी से पाल बांध कर धधकते अंगारे उनके नव-मुण्डित मस्तक पर रख दिये तया स्वयं गलियों में छुपता हुआ घर की ओर जाने लगा ।
इधर मुनि का मस्तक जलने लगा। किन्तु, आत्मा और शरीर की भिन्नता के चिन्तन से मूनि नहीं हटे। कुछ ही क्षणों में इस परमोत्कर्ष चिन्तन से वे सर्वज्ञ बन गये और निर्वाण प्राप्त कर लिया ।
संध्या समय वासुदेव श्रीकृष्ण प्रभु के दर्शनार्थ आए । बाल मुनि गजसुकुमाल को वहां न देख प्रभु से पूछा, तो प्रभु ने फरमाया-गजसुकुमाल मुक्त बन चुके हैं, तुम्हें कहां
से मिलेंगे ? फिर पूछने पर उन्होंने सारी घटना चुत्ता दी। क्षुब्धमना श्रीकृष्ण ने हत्यारे के बारे में पूछा तो भगवान् ने कहा-वापस राजमहल जाते हुए तुम्हें देखते ही जो व्यक्ति मर जायेगा, वही गजनुकुमाल का हत्यारा है।
कृष्ण वासुदेव वहां से चले, शोकाकुल होने के कारण वे राज मार्ग से न जाकर भीतरी रास्ते से राजमहल गये। रास्ते में सौमिल मिल गया। कृष्ण वासुदेव को देखते ही वह भय से वहीं गिर पड़ा। वासुदेव कृष्ण ने जान लिया कि हत्यारा यही है। रस्सी से उसका पैर हाथो के पैर के साथ बांध दिया गया और सारे शहर में घुमाया गया।
उत्कृष्ट तपस्वी ढंढंण
एक बार भगवान् नेमिनाथ द्वारिका पधारे। देवों ने समवशरण की रचना की। प्रवचन के उत्सुक द्वारिका के नागरिक विशाल संख्या में पहुंचे। वासुदेव कृष्ण भी आए। प्रवचन हुआ । देशना समाप्ति के बाद बासुदेव कृष्ण ने पूछा – भन्ते ! आपके श्रमण संघ में वैसे तो सभी साधनाशील हैं, किन्तु सर्वोत्कृष्ट तपस्वी कौन है? प्रभु ने कहा- वैसे तो मेरे धर्म संव में सभी श्रमण साधनारत हैं, किन्तु तपस्या में उत्कृष्टता आज तुम्हारे पुत्र ढंढण को प्राप्त है। जिसे दीक्षा लिये आज छः महीने बीत गये, मुख में पानी तक नहीं लिया ।
प्रभु ने आगे कहा- मैंने दीक्षा के दिन ही उसे कहा था-किसी दूसरे साथ के साथ जाओगे तो भोजन मिल जायेगा, वरना अन्तराय है, जब तक ये कर्म रहेंगे तब तक आहार पानी मिलेगा नहीं। ढंढण ने उसी क्षण मेरे से यै अभिग्रह के लिया था कि उसे जिस दिन स्वयं की लब्धि का आहार मिलेगा, उसी दिन वह ग्रहण करेगा। उससे पहले आहार मात्र का त्याग रहेगा। उस दिन से मुनि नियमित गोचरी जाता है, और समभाव से वापिस आकर स्वाध्याय-ध्यान में प्रवृत्त हो जाता है। वैसे छः महीने की तपस्या करना आसान है, किन्तु इस प्रकार अभिग्रह युक्त तपस्या करना आसान नहीं है। वास्तव में ढंढण घोर तपस्वी है, उत्कृष्ठ तपस्वी है।
वासुदेव कृष्ण ने भावविह्वल होकर पूछा-ढंढण मुनि अभी कहां है? मैं उनके दर्शन करूंगा। प्रभु ने कहा-राज महल जाते हुए तुम्हें ढंढंण के दर्शन रास्ते में हो जायेंगे। वासुदेव कृष्ण वन्दन करके राजमहल की ओर चल पड़े। रास्ते में ढंढंण मुनि गोचरी फिरते हुए मिले। वासुदेव कृष्ण हाथी से नीचे उतरे, विधिवत् बन्दना की। भगवान् नेमिनाथ के धर्मसंघ में उत्कृष्ट तपस्वी आप हो है, यह सुखद सूचना भी दी। मुनि मध्यस्थ भाव से आगे बढ़ गये। कृष्ण महाराज राजमहल की ओर चल पड़े ।
मुनि कुछ कदम आगे बढ़े। एक श्रेष्ठी अपने भवन से नीचे उतरा, बन्दना की। भिक्षा के लिये प्रार्थना की। मुनि गये, केशरिया मोदक एक थाल में भरे हुए थे। मुनि ने गवेषणा की मोदक लिये। मन में सोचा आज अन्तराय कर्म टूटा है, छः महीनों के बाद मुझे अपनी लब्धि का आहार मिला है। आज पारणा होगा ।
भगवान् के पास जाकर मुनि ने मोदक दिखलाए। पारणे की आज्ञा ली, प्रभु ने गम्भीर स्वर में कहा- ढडण । तुझे पारणा करना नहीं कल्पता। यह आहार तुम्हारी लब्धि का है नहीं, कृष्णजी की तब्धि का है। कृष्णजी से जब तुम्हें राज पथ में बन्दना की। उस समय श्रेष्ठी ने देख लिया था। कृष्ण महाराज प्रसन्न होंगे, इस भावना से उसने मोदक का दान दिया है। तुम्हारे से आकर्षित होकर या दान-भावना से दान नहीं दिया ।
भगवान् के वचनों को स्वीकार करते हुए ढंढंण ने प्रार्थना की प्रभो ! आज्ञा दें, इन मोदकों का परिष्ठापन कर दू ? मेरी लब्धि का न होने से मेरे लिये अखाद्य हैं. अभिग्रही होने के कारण दूसरों को दे नहीं सकता। भगवान् ने आज्ञा दी । डंडण जंगल की ओर चल पड़े। जंगल में अचित्त स्थान देख कर मोदकों को मिट्टी के साथ चूरने लगे। छह महीनों से भूखे होने पर भी उनकी भावना में कोई अन्तर नहीं पड़ा। प्रत्युत भावों की उध्वंगति और तीव्रता से होने लगी। इधर मोदक चूर रहे थे, उधर कर्म क्षीण हो रहे थे। कुछ ही समय में क्षपक-श्रेणी लेकर उन्होंने केवलत्व को प्राप्त किया। देवों ने केवल महोत्सव किया। अब ढंढंण मुनि अन्तराय रहित थे, छह महीनों के बाद सर्वज्ञ बनकर उन्होंने पारणा किया ।
द्वारिका-दहन
भगवान् नेमिनाथ ने अपने सर्वज्ञ-काल में अनेकों जनपदों की यात्रा की। किन्तु सर्वाधिक लाभ द्वरिका को मिला । अनेकों बार आप वहां पधारे, पावस प्रवास भी किया । एक बार प्रभु द्वारिका पधारे, तो वासुदेव कृष्ण सहित राज परिवार के लोग व द्वारिका के नागरिक रेवतगिरि पर्वत पर समवशरण में आए। भगवान् ने प्रवचन किया । अनित्यभावना का विशेष विश्लेषण किया।
प्रवचन के बाद बासुदेव कृष्ण ने पूछा- भन्ते ! हर वस्तु
अनित्य है, उत्पत्ति के बाद विनाश अनिवार्य है। अतः हमें बताये कि साक्षात स्वर्गपुरी सदृश इस द्वारिका का विनाश कब होगा ? भगवान् ने कहा- आज से बारह वर्ष बाद, द्वैपायन ऋषि के क्रुद्ध होने के कारण द्वारिका का दहन होगा। दहन सुनते ही सब कांप उठे, कृष्ण वासुदेव ने पुनः पूछा-भन्ते ! द्वैपायन ऋषि द्वारिका का दहन क्यों करेगा ? प्रभु ने बताया-मदिरा से उन्मत्त यादव कुमारों के सताने पर ऋषि क्रुद्ध होकर द्वारिका के दहन का निदान करेगा। वह मर कर देव होगा और द्वारिका का दहन करेगा।
कृष्ण ने पूछा-मेरी मृत्यु किससे होगी ? 
भगवान् – जराकुमार के बाण से ।
सब स्तंभित थे, विस्मित थे। अनेक व्यक्ति विरक्त होकर  
दीक्षित हो गये। द्वैपायन ऋषि स्वयं दूर जंगल में रहने लगे। जराकुमार म्लान-मना होकर वनवासी बन गया।
मदिरा निषेध
नगर में चारों तरफ एक ही चर्चा थी। सर्वत्र आतंक सा छा गया था। सबने मिलकर निर्णय लिया, दहन का हेतु मदिरा है। इसे खत्म कर दो। मद्य के अभाव में ऋषि को कोई सतायेगा नहीं, बिना सताये ऋषि क्यों दहन करेगा ? एक मद्य के निषेध से सारी समस्या हल हो जायेगी। इस निर्णय से जितना मद्य-संग्रह था उन्हें दूर जंगलों में पहाड़ों में गिरवा दिया गया। नया बनाना सर्वथा बन्द करवा दिया तथा द्वारिका की सीमा में मद्य पर कड़ा प्रतिबन्ध लगा दिया गया ।
दीक्षा की दलाली
कृष्ण वासुदेव ने द्वारिका दहन की भविष्यवाणी के बाद द्वारिका में एक उद्घोषणा करवा कर लोगों को सूचित किया-किसी को अगर दीक्षा लेनी हो तो वह शीघ्रता करे, उनके अगर व्यावहारिक कठिनाई हो तो मैं दूर करूंगा । किसी के माता-पिता वृद्ध हों तो उनकी सेवा मैं करूंगा । अगर किसी की संतान छोटी है तो उसका पालन-पोषण मैं करूंगा। दीक्षा लेने वाले निश्चित होकर दीक्षा लें। मैं अभी गृहस्थ में हूं, अतः व्यावहारिक जिम्मेदारी सारी में उठाऊंगा। इस घोषणा से प्रभावित होकर अनेकों व्यक्ति साघु बने ।
द्वैपायन का निदान
भवितव्यता मिटाई मिट नहीं सकती। मदिरा के ‘भंडार’ समाप्त कर दिये गये थे। द्वारिका में पूर्णतया मद्य निषेध लागू हो गया था। पूरी जागरूकता बरतने के बावजूद भी 
निमित्त मिलना था वह तो मिला हो। पावस ऋतु में जोरों की वर्षा हुई, आस-पास के ताल तलैया सब भर गये। शाम्ब आदि अनेकों यादव कुमार भ्रमण के लिए निकले। घूमते-घूमते वे दूर जंगल में चले गये। प्यास लगी, वहीं पर गड्‌डों में एक-त्रित पानी से प्यास बुझाई। उस पानी में मिराई हुई शराब वह कर आई हुई थी। प्यास तो बुझ गई किंतु उन्मत्तता आ गई। सभी मदहोश हो गये। संयोगवश थोड़ी दूरी पर उन्हें द्वैपायन ऋषि मिल गये। नशे में उन्मत्त यादव कुमारों ने ऋषि को खूब सताया। ऋषि लंबे समय तक शांत रहे, किंतु अन्त में युवकों की यातना से वे उत्तेजित हो उठे। सोचने लगे ऐसे युवक ही अब द्वारिका में रहे हैं, बाकी तो सब दीक्षित हो चुके हैं। इन को तो भस्म करना ही ठीक है। ऋषि ने गस्से में चिल्लाकर कहा- तुम अभी सताते हो, मैं तुम्हारा बदला पूरी द्वारिका को जलाकर लूंगा ।
यह सुनते ही युवकों को होश आया। उनका नशा झटके के साथ उतर गया। सब पश्चाताप करने लगे। यादव कुमारों की उदण्डता का पता श्रीकृष्ण को लगा। श्रीकृष्ण और बलराम ने आकर ऋषि का खूब अनुनय-विनय किया। अत्यंत विनय करने के बाद भी द्वैपायन ऋषि ने सिर्फ इतना ही कहा-तुम दोनों को छोड़ूगा, शेष द्वारिका में कुछ नहीं बचेगा। सब कुछ स्वाहा करके ही मैं शांत बनुं गा। स्पष्ट उत्तर मिलने पर श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों निराश होकर वापस आ गये।
तीर्थंकरत्व की घोषणा
भगवान् नेमिनाथ पुनः द्वारिका पधारे। कृष्ण वासुदेव ने दर्शन किये, किन्तु आज वे खिन्नमना थे। प्रभु से कहने लगे, लोग भारी संख्या में संयम ले रहे हैं, क्या मेरे कोई अन्तराय है ? भगवान् ने कहा-कृष्णजी। वासुदेव के साथ कुछ ऐसी नियति होती है कि वे साधु नहीं बनते। किन्तु तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये। अगली उत्सर्पिणी में आप अमम नाम के बारहवें तीर्थंकर बनोगे। ये बलरामजी तुम्हारे धर्म शासन में मुक्त बनेंगे। यह सुनते ही सर्वत्र हर्ष छा गया।
भगवान् विहार कर गये। लोग धर्म की विशिष्ट उपासना करने लगे । उपवास आयंबिल विशेष रूप से होने लगे। इधर द्वैपायन आयुष्य पूर्ण कर अग्निकुमार देव के रूप में उत्पन्न हुए। उन्होंने अवधि दर्शन से देखा, पूर्व वैर जागृत हुआ। तत्काल देव द्वारिका दहन के लिए पृथ्वी पर आ गया। किन्तु, घर-घर में धर्म की समुचित उपासना देखकर वह द्वारिका को जला नहीं सका । वर्षों तक वह द्वारिका के आस-पास घूमता रहा। छिद्र देखता रहा। कहीं कमी हो तो किसी तरह अपनी इच्छा पूरी करे। किन्तु, आयंबिल की सतत उपासना होने से वह वैसा नहीं कर सका।
ग्यारह वर्ष से ऊपर समय बीत गया। लोगों ने सोचा, संकट का समय निकल चुका है। अब इस तपस्या की क्या जरूरत है ? विचारों में ह्रास एक साथ हो आया और सबने तपस्या छोड़ दी। द्वैपायन को अवसर मिल गया। उसने अग्निवर्षा की और सब कुछ जलाना चाहा। वासुदेव कृष्ण और बलरामजी अपने पिता वासुदेव, माता रोहिणी और देवकी को रथ में बिठाकर, स्वयं रथ को चलाकर नगर से बाहर ले जाने लगे। किंतु, राजमहल से बाहर आते-आते बीच में दीवार गिर पड़ी। कृष्ण और बलराम तो बाहर आ गये। किन्तु माता और पिता अन्दर ही रह गये। वसुदेवजी ने कहा- तुम हमारी चिन्ता छोड़ो और सकुशल जाओ। हम सब भगवान् की शरण में गाते हैं।
प्रभु का परिवार
गणधर-  ‌ग्यारह (वरदत आदि)
केवल ज्ञानी –  एक हजार छह सौ
मनःपयंव ज्ञानी-  एक हजार
अवधि ज्ञानी  – एक हजार पांच सौ
चतुर्दश पूर्वी-  चार सौ
चर्चावादी-   आठ सौ
वैक्रिय लब्धिवारी – एक हजार पांच सी
साधु -अठारह हजार
साध्वियां-चालीस हजार (प्रवतिनी यक्ष दिन्ना)
श्रावक- एक लाख उनहत्तर हजार
श्राविकाएं  -तीन लाख छत्तीस हजार
निर्वाण
भगवान् ने अपने भव-विपाकी कमाँ (बेदनीय, नाम, गोत्र, अंतराय) का अंत निकट देखकर चरम शरीरी, (तद्भव मोक्ष जाने वाले) पांच सौ छत्तीस मुमुक्षुओं के साथ आजीवन अनशन व्रत रेवतगिरि पर्वत पर स्वीकार कर लिया। भगवान् का अनशन तीस दिनों तक चला। श्रावण शुक्ला अष्ठमी के दिन प्रभु ने नश्वर शरीर छोड़कर सिद्धत्व को प्राप्त कर लिय।। चौसठ इंद्रों व देवताओं की भारी भीड़ भगवान् के शरीर के नीहरण समारोह में आये। जनता की भीड़ का तो ठिकाना ही क्या ? जिधर देखो उधर आदमी ही आदमी नजर आ रहे थे। सबके हृदय में भगवान् के विरह का भारी विषाद था। 
पांच कल्यानक तिथियां –
१. च्यवन- कात्तिक कृष्णा १२
२. जन्म – श्रावण शुक्ला ५
३. दीक्षा- श्रावण शुक्ला ६
४. कैवल्य-प्राप्ति- आश्विन कृष्णा १५
५. निर्वाण – श्रावण शुक्ला ८
६.कैवल्य वृक्ष -Indian willow Tree
७.प्रतीक -Conch

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