सौने री चिड़कली रे, प्यारो म्हारो देसड़ो।
अठै नर वीरां री खान जगत अगवाणी रै।।
दूध दही री अठै नदियाँ बहती।
रिध सिध साथै नव निध रहती।।
होती अठै मोकळी गायां।
रहती फळफूलां री छायां।।
करसा अन्न घणो निपजाता।
बांनैं देख देव हरसाता।।
शस्य श्यामला रै भारत भोम है।
ई रो अन्नपूर्णा रूप, दुनियां जाणी रै।।
सौने री चिड़कली रे, प्यारो म्हारो देसड़ो।
अठै नर वीरां री खान जगत अगवाणी रै।।
आ धरती नर नाहर जाया।
नारयां भी रण में हाथ दिखाया।।
सूरा लड़ता शीश कटयोड़ा।
देख्यां पीछै नहीं हटयोड़ा।।
रण में सदा विजय ही पाई।
सारै धरम ध्वजा फहराई।।
आ तो करम भौम है रै भगवान री।
लियो बार बार अवतार अमर कहाणी रै।।
सौने री चिड़कली रे, प्यारो म्हारो देसड़ो।
अठै नर वीरां री खान जगत अगवाणी रै।।
आ धरती। है ऋषि मुनियां री।
चिन्ता करती सब दुनियां री।।
गूंजी अठै वेद री वाणी।
गीता रण में पड़ी सुणाणी।।
विकस्यो हो विज्ञान अठै ही।
जलमी सारी कळा अठै ही।।
आ तो जगत गुरु ही रै भारत भारती।
अब तन मन जीवण वार बा छवि ल्याणी रै।।
सोनै री चिड़कली रै प्यारो म्हारो देसड़ो।