Bhor Bhor Uth Kar Prabhu Ne Sumirle

मंगल स्तुति (लय : बादळियो..)

रचयिता : साध्वी जतनकुमारीजी
भोर-भोर उठ कर प्रभू
भोर-भोर उठ ‘कर प्रभू नै सुमरलै
भव-जल तूं तर ज्यावैला ओ , मनवा । 
प्रभू नाम च्यांनणिये स्यूं आंगणियै नै भरलै,
 अंधियारो मिट ज्यावैला, ओ मनवा ।।
१. ऋषभ, अजित, संभव, अभिनन्दन है, 
सुमति, पद्म, सुपार्श्व जग वंदन बंधनहै
 सब कट ज्यावैला, ओ है। मनवा ।।
२. चन्द्रप्रभु, सुविधि, शीतल, श्रेयांस है,
वासुपुज्य, विमल, अनन्त गुण-राश है । ़ ।।
 आनन्दमय दिन ज्यावैला, ओ मा
नव 
३. धर्म, शांति, कुन्थु, अर, मल्ली भगवान है, 
मुनिसुव्रत, नमि, नेमि, पारस, वर्धमान है । 
सुख सम्पति बढ़ ज्यावैला, ओ मनवा ।।
४. इग्यारह है गणधर बीस विहरमाण है,
 सोलह सतियां रो नाम करै कल्याण है । 
पावन तूं बण ज्यावैला, ओ मनवा ।।
५-भिक्षु, भारीमाल, राय, जय, मघराज है, 
माणिक, डालिम, कालू, तुलसी शासन सिरताज है । महाप्रज्ञ भावैला, ओ मन मनवा । ‘
जतन’ काम बण ज्यावैला, ओ मनवा ।।

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