(तर्ज – लकड़ी की काठी)
नया सवेरा आया नई रोशनी लाया।
हीरे जैसा मानव जीवन पुण्योदय :से पाया ।।
भेदभाव को भूलो, समता, रस में फूलों ।
परमात्मा को पानी है तो संतो के पद छूलो ।।
झुक झुक-२
ऊँचा निज आचार हो प्रेम भरा व्यवहार हो ।
. एक बनों और नेक बनों सबमे गहरे संस्कार हो ॥
सचमुच -२
मैं बड़ा तू छोटा यह अभिमान खोटा
अस्थिर हैं यह काया माया ज्यों जल का परकोटा
जगबुझ -२
संतो की यह टोली, भर दो इसकी झोली।
दुर्व्यसनों को त्यागो जागो सीख कनक अनमोली ।।
सुन सुन-२