तेरे जैसा राम भक्त हुआ न होगा मतवाला
(तर्ज : क्या मिलिए ऐसे लोगों से)
तेरे जैसा राम भक्त, कोई हुआ न होगा मतवाला । एक जरा सी बात की खतिर, सीना फाड़ दिखा डाला ।। टेर ।।
आज अवध की शोभा लगती, स्वर्ग लोक से भी प्यारी। चौदह वर्षों बाद राम की, राज तिलक की तैयारी, हनुमत के दिल की मत पूछो, 2 झूम रहा है मतवाला ।। 1।। एक जरा सी ….
रत्न जड़ित हीरों का हार जब, लंकापति ने नजर किया। राम ने सोचा आभूषण है, सीताजी की ओर किया । सीता ने हनुमंत को दे दिया 2 इसे पहन मेरे लाला ।। 2।। एक जरा सी …..
हार हाथ में लेकर हनुमत, घुमा फिरा कर देख रहे। नहीं समझ में जब आया तब, तोड़-तोड़ कर फेंक रहे । लंकापति मन मे पछताया- 2 पड़ा है बंदर से पाला ।। 3 ।। एक जरा सी …..
लंकापति का धीरज टूटा, क्रोध की भड़क उठी ज्वाला । भरी सभा में बोल उठा, क्या पागल हो अंजनी लाला अरे हार कीमती तोड़ दिया 2 क्या पेड़ का फल समझ डाला ।। 4 ।। एक जरा सी …..
हाथ जोड़कर हनुमंत बोले, मुझे है क्या कीमत से काम । मेरे काम की चीज वहीं है, जिसमें बसते सीता राम । राम नजर ना आया इसमें – 2 यूं बोले बजरंग बाला ।। 5 ।। एक जरा सी
इतनी बात सुनी हनुमंत की, बोल उठा लंका वाला । तेरे में क्या राम बसा है, बीच सभा में कह डाला । चीर के सीना हनुमंत ने – 2. सियाराम का दरश करा डाला ।। 6।। एक जरा सी ….