जम्बूकुमार की सज्झाय
जम्बू ! कह्यो मान लै जाया, मत ले संजम भार ।
राजगृही नं वासिया जी, जम्बू नाम कुंवार ।
ऋषभदत्त रा डीकरा जी, भद्रा ज्यांरी माय ।।
जम्बू कह्यो…
सुधर्मा स्वामी पधारिया जी, राजगृही रे मांय ।
कोणक बांदण चालियो जी, जम्बू बांदण जाय ।। भगवन्त वाणी बागरी जी, बरसै इमरत धार ।
वाणी सुण वैरागियो जी, जाण्यों अथिर संसार ।।
घर आया माता कनै जी, बिनवै बारम्बार ।
अनुमति दिज्यो मोरा मात जी, मैं लेस्यूं संजमभार ।। माता मोरी सांभलो, मैं लेस्यूं संजमभार ।
माता- ये आठू ही कामणी जम्बू ! अपछर रै उणिहार । परणी नै किम परिहरो, ज्यांरो किम निकलै जमवार ।
ये आठू ही कामणी जम्बू ! तुझ बिन बिलखी थाय । रमियां ठमियां सूं नीसरै, ज्यांरो वदन कमल बिलखाय ।।
जम्बू- मतिहीणा कोई मानवी माता ! मिथ्या मत भरपूर । रूप रमणी सूं राचिया, ज्यांरी नहि हुँवै दुर्गति दूर ।।
माता मोरी…
माता -पाल पोष मोटो कियो जम्बू !इम किमयो छिटकाय । मात पिता मैलै झूरता, थारै दया नहीं आवै दिलमांय ।।
जम्बू -एक लोटो पाणी पियो, माता ! मायर बाप अनेक । सगलां री दया पालसू, माता! आणि चित्त विवेक ।।
माता -ज्यूं आंधा रै लाकडी, जम्बू ! तूं म्हारै प्राण आधार । तुझ बिन म्हारै जुग सुनो जाया ! जननी जीतब राख ।।
जम्बू -रतन जडत रो पिंजरो, माता ! सुवो जाणै सोई कन्द । काम भोग संसार ना, माता ! ज्ञानी जाणै झूठो फन्द ।।
माता -पांच महाव्रत पालणा, जम्बू ! पांचू ही मेरू समान दोष बयालीस टालणा, जम्बू ! लेणो सूझतो आहार
जम्बू – पांच महाव्रत पालस्यू, माता ! पांचू ही शिखर सम्मान दोष बयालीस टालस्यूं, माता ! लेस्यूं सूझतो आहार
माता- संजम मारग दोहिलो, जम्बू ! चालणो खांडे री धार नदी किनारे रूखडो, जम्बू ! जद कद होवै छार
चांद बिना किसी चांदनी, जम्बू ! तारां बिना किसीरात
वीर बिना किसी बहनड़ी, जम्बू ! झूरसी बार तिवार दीपक बिन मंदिर सूनो, जम्बू ! पुत्र बिना परिवार
कन्थ बिना किसी कामणी, जम्बू ! झूरसी बांरूं ही मास
जम्बू -मात पिता मेलो मिल्यो, माता ! मिल्यो अनन्ती वार तारण समरथ कोई नहीं, माता ! पुत्र पिता परिवार।
मोह मत करो मोरा माताजी ! मोह कियां बधै कर्म
हालर हूलर कांय करो माता ! करज्यो जिनजी रो धर्म
माता ए आठू ही कामणी जम्बू ! सुख विलसो संसार औरदिन पाछा पड़ियां पीछै, थे तो लीज्यो संजम आर
जम्बू ए आठू ही कामणी, माता ! समझाई एकण रात जिनजी रो धर्म पिछाणियो, माता ! संजम लैसी म्हारै साथ
मात पिता नै तारिया जम्बू ! तारी छै आठूं ही नार
सासू-सुसरा ने तारिया, जम्बू ! पांच सौ प्रभव परिवार। पांच सौ सताईस जणां स्यू जम्बू लीन्यो संजम भार इग्यारह जीव मुगती गया, साधु बाकी स्वर्ग मंझार
(तर्ज – रे धन्ना आज निहेजो)
★★★