तर्ज : (जरा सामने तो आओ छलिये )
श्री पार्श्व प्रभु चिन्तामणी, दीन बन्धु तँ ही दीना नाथ है. भव-भव के तो बन्धन काट दो, तेरे शरणे पड़े हम अनाथ हैं।
जलते नाग नागिन को बचाया, नवकार मंत्र सुनाया, कमठ योगी का मान मिटाकर, सच्चा मार्ग दिखाया,
फिर हम पै क्यों इतने नाराज हैं, क्यों न सुनते हमारी आवाज हैं ॥ १ ॥ भव-२ ॥
कर्मों के कांटे बिखरे राह में, मंजिल दूर थका हूं मुसाफिर, क्यों न रखते हमारे सिर पै हाथ है,
दिल ना सके मेरे पाँव, में मुक्ति की चाह,
हम दुःखियों को तेरा हो साथ है ॥ २ ॥ भव-२ ॥
भूठे रिश्ते झूठे नाते, झूठा ये संसार,
कहाँ भटकते फिरें है भगवन् ! तेरा ही आधार,
“वीर मंडल” की ये ही अरदास है.
तेरे द्वारे खड़े जोड़े हाथ हैं, ॥ ३ ॥ भव-२ ॥