(लय : चांदी की दीवार न तोड़ी)
छोड़ दिया घरबार नेमजी, सुखवैभव को छोड़ दिया, संयमपथ को धार नेमजी, भवसागर को पार किया ।। ध्रुव ॥
१. आये तो थे ब्याह रचाने, छाई हुई थी खुशियाली
तीन लोक के जानने वाले, देखी वहां घटा काली
लाखों पशु बिलखते रोते, मौत अभी आने वाली
उनकी करुण पुकार को सुनकर, तोरण से रथ मोड़ लिया।
२. टूट पड़ा था पहाड़ हृदय पर, अश्रुधारा आन पडाँ व्याकुल होकर रोये राजुल, हाय ये कैसी दुःख की घड़ी कैसे कर्म किये जो मैंने, ऐसी विपदा आन पड़ी चढ़ गये गढ़गिरनार नेमजी, मुझ से नाता तोड दिया ॥
३. मात पिता सखियां समझाएं, हिये राजुल के ना आए जाग उठी वैराग्य भावना, राह त्याग की अपनाने
चली ढूंढने नेम को राजुल, रतन अमोलक को पाने
सहसा वन में मिले नेमजी. दोनों ने व्रत धार लिया। है
४. युग बीते और सदियां बोती. समय बीतता जाताहै सोलह सतियों की श्रेणी में नाम राजुल का आता है
‘नेम राजुल’ के अमर गुणों को हम सब मिलकर गाते है ज्ञान का दीप जलाकर के, अज्ञान तिमिर को हटा दिया।
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