कल्पतरु रा बीज
(लय : लूटाकर लंका रो राज)
कल्पतरु रा बीच फल्या, बलिदाना रा सुमन खिल्या. आं सुमनां री सौरभ लेवण, आवो म्हांरा स्वामीजी।
एकर तो पधारो नी ॥ स्थायी ॥
दीपां सुत शासन सिरताज नाम सुमरताँ फलज्या काज भगतां नै आशीर्वर देवण ॥१ ॥ आवो…
थांरो शासन जग रो त्राण, ई शासन नै अर्पित प्राण आ प्राणा नै अमरत सेवण ॥२ ॥ आवो…
निज हाथां स्यूं लिख्यो विधान, संघ संगठन बण्यो महान उण नै पाछो आज पलेवण ॥३ ॥ आवो…
काटी करमां री जंजीर, कष्टां में ना बण्या अधीर वां कष्टां री कहाण्यां केवण ॥४॥ आवो…
आलोकित नभ धरा दिगन्त जठै निकाल्यो तेरापंथ उण ओरी में अब तो रैवण ॥५ ॥ आवो…
पल पल छिन-छिन ध्यावा ध्यान, श्रद्धानत हो करा प्रणाम म्हां सगलां री नैया खेवण ॥ ६ ॥ आवो…