कल्याण-मन्दिर की साधनाः
आचार्य सिद्धसेन दिवाकर रचित यह काव्य बहुत ही चमत्कारिक है। इसका स्मरण पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके सूर्यास्त होने के समय से लेकर रात्रि के दस बजे तक करें। लम्बे समय तक निरन्तर जाप करने वालों को उपवास सहित भगवान पार्श्वनाथ के जन्म दिवस पौष कृष्णा १० से प्रारंभ करना चाहिये।
कल्याण-मन्दिर का पांचवां काव्य लक्ष्मी और व्यापार के लिये, छठा संतान प्राप्ति के लिए है। दसवें से सब प्रकार के भय दूर होते हैं। सतरहवें से गृह कलेश दूर होता है। पच्चीसवें से रोग-शोक दूर होते हैं। सताईसवें से शत्रु शांत हो, विजय हो। इकतीसवें से शुभाशुभ प्रश्न का उत्तर मिले। सैतीसवें से राजा, प्रजा और परिवार में सम्मान हो, प्रतिष्ठा नढ़े। तैतालीसवें से बन्दीखाने से छूटे, सब प्रकार से लक्ष्मी का लाभ हो।
(प्रतिदिन एक माला का जाप करना चाहिए।)
श्री कल्याण-मन्दिर स्तोत्र
(पद्यानुवाद मुनि छत्रमल)
१. कल्याण मन्दिरमुदारमवद्य-भेदि,
भीताभय-प्रदमनिन्दितमंहिपद्मम् ।
संसार-सागर-निमज्जदशेष-जन्तु-
पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य ॥
श्री कल्याण सदन सुन्दर, सब पाप प्रणाशक, दिव्य, उदार, दुखों से आकूल प्राणी को देते अभयदान हर बार। इस संसार-सिंधु में गिरते हुये जीव-हित पोत-ललाम,
ऐसे श्री जिनदेव चरण में कोटि-कोटि मैं करूं प्रणाम।।
२. यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशेः,
स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम् ।
तीर्धेश्वरस्य कमठस्मय – धूमकेतोस्
तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये ॥
कमठ देव के अहंकार को राख बनाने अग्नि समान, गुणगरिमा की गहराई है जिनकी महासिन्धु उपमान
सुर-गुरु भी स्तुति करने में है, स्वयं मानता अपनी हार, उन श्री पार्श्वनाथ की स्तुति हित, मैं तो बन बैठा तैयार।।
७२. मंगल किरण
३. सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-मस्मादृशाः कथमधीश ! भवन्त्यधीशाः ।
धृष्टोऽपि कौशिक-शिशुर्यदि वा दिवान्चो,
रूपं प्ररूपयति किं किल घर्मरश्मेः ॥
महामहिम ! तेरा स्वरूप तो सचमुच दुर्गम रहा अतीव, सही-सही क्या बतला सकता मेरे जैसा पामर जीव।
दिन में अन्धा बन उल्लू-सुत जो निज समय बिताता है, करे ढीठता तो भी क्या रवि रूप बताने पाता है।।
४. मोहक्षयादनुभवन्नपि नाथ! मरत्यो, नूनं गुणान् गणयितुं न तव क्षमेत ।
कल्पान्त-वान्तपयसः प्रकटोऽपि यस्मान्,
मीयेत केन जलधेर् ननु रत्नराशिः ॥
मोह नष्ट कर केवल ज्ञानी, तेरे गुण सब लेते जान,
किन्तु न वे भी अपने मुख से कर पाते है कभी बखान। प्रलय-काल में शुष्क सिन्धु के रत्न दीख सब जाते हैं, किन्तु किसी की भी गणना में वे न कभी आ पाते हैं।।
५. अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ! जडाशयोऽपि
कर्तुं स्तवं लसदसंख्यगुणाकरस्य
बालोऽपि किं न निजबाहुयुगं वितत्य,
विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशेः ॥
यद्यपि मैं हूं तुच्छ बुद्धि प्रभु! आप गुणों के हैं आगार, किन्तु भक्तिवश स्तुति करने का मैंने कुछ-कुछ किया विचार।
माना, सागर है विशाल पर बतलाने उसका विस्तार,
नन्हे-नन्हे कर फैला शिशु क्या न बताता है आकार।।
६. ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश !
वक्तुं कथं भवति तेषु ममावकाशः ।
जाता तदेवमसमीक्षित-कारितेयं,
जल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि ॥
बड़े-बड़े योगी भी रखते जब स्तुति का सामर्थ्य नहीं, किया कार्य प्रारम्भ किन्तु स्थिति मेरे काबू में न रही।
क्यों हताश मैं बनूं यथासम्भव करने का करूं प्रयास,
नर भाषा अनभिज्ञ विहग क्या तजता निज भाषा अभ्यास ।।
आस्तामचिन्त्य महिमा जिन ! संस्तवस्ते,
नामाऽ पि पाति भवतो भवतो जगन्ति ।
तीव्रातपोपहत-पान्थजनान् निदाघे,
प्रीणाति पद्मसरसः सरसोऽनिलोऽपि ॥
है अचिन्त्य तेरी महिमा प्रभु ! क्या उसका कहना जगतार, केवल तेरा नाम सभी कष्टों का करता है संहार। कमल-सरोवर भले दूर हो पर, उसका शुभ-शीत-पवन, गर्मी से संतप्त मनुज का आनन्दित कर देता मन।।
८. हृद्ववर्तिनि त्वयि विभो ! शिथिलीभवन्ति,
जन्तोः क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धाः ।
सद्यो भुजंगममया इव मध्यभाग
-मभ्यागते वनशिखंडिनि चन्दनस्य ॥
ध्यान-शील जिस भक्त हृदय में आप लगाते निज आसन, उसके ढीले पड़ जाते हैं सभी निविड़तम अघ-बन्धन। वन-मयूर ज्योंही बढता है भगवन ! चन्दन तरु की ओर, भाग खड़े होते हैं उस पर लिपटे सारे विषधर घोर।।
९. मुच्यन्त एव मनुजाः सहसा जिनेन्द्र !
रौद्ररुपद्रवशतैस् त्वयि वीक्षितेऽपि
गो-स्वामिनि स्फुरित-तेजसि दृष्टमात्रे,
चौरैरिवाशु पशवः प्रपलायमानैः ।।
देव तुम्हारे दर्श-मात्र से विपदाओं का होता नाश, प्रभु-दर्शन के साथ कभी न निभ सकता सहवास।
निशि में मौका पा पशुओं को चोर चुरा ले जाते हैं, पर,
स्वामी के आते ही तज उन्हे भाग जाते हैं
. त्वं तारको जिन ! कथं भविनां त एव,
त्वामुद्व वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्तः ।
यद् वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून-
मन्तर्गतस्य मरुतः स किलानुभावः ॥
भव-सागर से भव्य जनों के आप बनें कैसे तारक,
जबकि वहन कर रहे आपको हृदयों में वे वन-धारक। समझ गया मैं मशक यहां पर तैर रही है जो जल में,
उसी पवन का है प्रभाव जो स्थित उसके अन्तस्तल में।।
११. यस्मिन् हर-प्रभृतयोऽपि हतप्रभावाः
सोऽपि त्वया रतिपतिः क्षपितः क्षणेन ।
विध्यापिता हुतभुजः पयसाथ येन,
पीतं न किं तदपि दुर्धर-वाडवेन ॥
कामदेव से हरि हरादि ने बुरी तरह से खाई हार,
मार उसी को, कैसे विजयी आप बन गये जगदाधार?
पर क्या है आश्चर्य वारि जो जग की अग्नि बुझाता है, वही प्रचंड बड़वानल द्वारा क्या न पी लिया जाता है।।
१२. स्वामिन्ननल्प-गरिमाणमपि प्रपन्नं
त्वां जन्तवः कथमहो हृदये दधानाः ।
जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन,
चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभावः ॥
प्रभु अनन्त तेरी गरिमा को भक्त हृदय में धरते हैं,
फिर भी हल्के रह कर कैसे भव सागर को तरते हैं।
मुझे लग रहा सभी असंभव संभवता में ढल जाते, क्योंकि अचिन्त्या शक्ति तुम्हारी, थाह नहीं हम ले पाते।।
१३. क्रोधस्त्वया यदि विभो ! प्रथमं निरस्तो,
ध्वस्तास्तदा बत कथं किल कर्मचौराः ।
प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके,
नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी ।।
नाथ! आपने सर्वप्रथम यदि नाश क्रोध का कर डाला, कर्म-दस्युयों से फिर कैसे किया आपने है टाला।
समझ गया मैं सदा क्रोध से शक्ति क्षमा की बड़ी रही, अग्नि जलाती वन को पर क्या हिम भी करता नाश नहीं।।
१४. त्वां योगिनो जिन ! सदा परमात्मरूप-
मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुज-कोशदेशे।
पूतस्य निर्मलरुचेर्यदि वा किमन्य-
दक्षस्य संभवि पदं ननु कर्णिकायाः ॥
कमल-कर्णिका बिना कहीं क्या कमल-बीज मिल सकता है, हृदय-कमल की दिव्य कर्णिका में सत्चित् झिलमिलता है। सिद्ध रूप को पाने योगी हृदय टंटोला करते हैं, तुझ को पाने मन की उलझी गांठें खोला करते हैं।।
१५. ध्यानाज्जिनेश ! भवतो भविनः क्षणेन,
देहं विहाय परमात्मदशां व्रजन्ति ।
तीव्रानलादुपल-भावमपास्य लोके,
चामीकरत्वमचिरादिवधातुभेदाः ॥
शुद्ध भाव से हे जगदीश्वर! ध्यान आपका करने से,
प्राप्त करें परमात्म-दशा जन सब कलि-मल-दल हरने से। बिना अग्नि में पड़े कनक में मिट्टी सदा अखरती है,
ज्ञान-अग्नि में तपे बिना कब सच्ची-प्रभा निखरती है।।
१६. अन्तः सदैव जिन ! यस्य विभाव्यसे त्वं,
भव्यैः कथं तदपि नाशयसे शरीरम् ।
एतत्स्वरूपमथ मध्यविवर्तिनो हि,
यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावाः ॥
जिस तन के माध्यम से भगवन्, लोग तुम्हारा करते ध्यान, करते अन्त उसी का, यह कैसी गति चलते हैं श्रीमान। महापुरुष मध्यस्थ जहां फिर वहां विग्रहों का क्या काम, कलह रूप हो या तन ही पर करते आप समाप्त तमाम।।
१७. आत्मा मनीषिभिरयं त्वदऽभेदबुद्धया,
ध्यातो जिनेन्द्र ! भवतीह भवत्प्रभावः । पानीयमप्यमृतमित्यनुचिन्त्यमानं,
किं नाम नो विषविकारमपाकरोति ।।
आत्म-चेतनामय मनीषिगण तेरे साथ जोड़कर तान, आत्मा से परमात्मा बनता जब अनुरूप लगाता ध्यान। साधारण जल भी अभिमंत्रित अमृतमय बनता भरपूर, हर स्थिति में उपयोगी बन वह विष-विकार को करता दूर।।
१८. त्वामेव वीततमसं परवादिनोऽपि,
नूनं विभो ! हरिहरादिधिया प्रपन्नाः ।
किं काचकामलिभिरीश ! सितोऽपि शंखो,
नो गृह्यते विविधवर्णविपर्ययेण ।।
तेरी वीतरागता से प्रभु सारा परिचित है संसार,
फिर भी हरि हर आदि रूप में तुझे कई करते स्वीकार। रोग पीलिया होने पर यदि शंख लगे पीला-पीला,
उसमें उसका दोष न कुछ भी यह है रोगों की लीला।।८०. मंगल किरण
१९. धर्मोपदेशसमये सविधानुभावा-
दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोकः ।
अभ्युद् गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि,
किं वा विबोधमुपयाति न जीवलोकः ॥
धर्मदेशना के अवसर जितनी सी संगति पाता है
मानव की क्या बात वहां तरु भी अशोक बन जाता है। सूर्योदय होने पर क्या केवल नर ही जागृति पाता है, कमल आदि सब जीव लोक क्या नहीं विकस्वर हो जाता है।
२०. चित्रं विभो ! कथमवाङ्मुखवृन्तमेव,
विष्वक् पतत्यविरला सुरपुष्पवृष्टिः ।
त्वद्गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश !
गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि ॥
जब नभ में सुर सुमन गिराते तब सब उर्ध्व-मुखी गिरते, ऊपर रहती कलियां डन्ठल तो सब के नीचे रहते।
बात ठीक है, सु-मन आपके जो चरणों में झुकते हैं, उसके बन्ध खिसकते नीचे ऊपर उभर न सकते हैं।।
२१. स्थाने गभीरहृदयोदधिसम्भवायाः,
पीयूषतां तव गिरः समुदीरयन्ति ।
पीत्वा यतः परमसम्मद-संग-भाजो,
भव्या व्रजन्ति तरसाऽप्यजरामरत्वम् ॥
हृदय-सिन्धु से उठने वाली वाणी तेरी सुधा समान,
उचित कथन यह-जो कहते आए हैं ज्ञानीजन गुणवान। क्योंकि इसे पीने वाला नर परमानन्द युक्त होकर, जन्म-मृत्यु के पार पहुँचता, बन जाता है अजर-अमर।
२२. स्वामिन् ! सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो,
मन्ये वदन्ति शुचयः सुरचामरौधाः ।
येऽस्मै नतिं विदधते मुनिपुंगवाय,
ते नूनमूर्ध्वगतयः खलु शुद्धभावाः ॥
सदा डुलाए जाने वाले देवों द्वारा श्वेत चंवर,
मौन सूचना देते सबको, नीचे झुक ऊपर उठकर।
जिनवर को जो नमस्कार करते हैं श्रद्धा से झुककर,
वे हम जैसे निर्मल होकर जाऐंगे निश्चित ऊपर।।८२. मंगल किरण
२३. श्यामं गभीर-गिरमुज्जवल- हेमरत्न-
सिंहासनस्थमिह भव्यशिखण्डिन स्त्वाम् ।
आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चैश
-चामीकराद्रि-शिरसीव नवाम्बुवाहम् ।।
हेमरत्नमय सिंहासन पर आप विराजित होते हैं,
गुरु गम्भीर देशना स्वर से प्यास सभी की खोते हैं। श्यामकाय प्रभु लगते हैं तब भव्य मयूरों को ऐसे,
कंचन गिरि पर उमड़-घुमड़ नव अंबुद आया हो जैसे।।
२४. उद्गच्छता तव सितद्युति-मण्डलेन, लुप्तच्छदछविरशोकतरुर्बभूव ।
सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग !
नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि ॥
तेरे तन से निकल-निकल जब नील कांति ऊपर जाती, राग (रंग) हीन बनते अशोक के पत्र, लालिमा उड़ जाती। वाणी सुनना ध्यान लगाना तो है बहुत बड़ी-सी बात
, मात्र पास में रहने वाला वीतराग हो जाता नाथ।।
२५. भो! भो! प्रमादमवधूय भजध्वमेन
-मागत्य निर्वृतिपुरीं प्रति सार्थवाहम् ।
एतन्निवेदयति देव! जगत्त्रयाय,
मन्ये नदन्नभिनभः सुरदुन्दुभिस्ते ॥
सार्थवाह है मोक्षपुरी के जाने-माने पारसनाथ,
जो मुमुक्षु चलने के इच्छुक कान खोलकर सुन लें बात। शीघ्र त्याग आलस्य इन्हीं की सेवा में तुम आ जाओ, कहती सुमनस-दुन्दुभि सबको,समय गंवामतपछताओ।।
२६. उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!
तारान्वितो विधुरयं विहताधिकारः ।
मुक्ताकलाप-कलितोल्लसितातपत्र-
व्याजात् त्रिधा धृततनुर्भुवमभ्युपेतः ॥
जब तुमने निज दिव्य ज्ञान से तीन लोक में किया प्रकाश, छीने जाने पर कर्तव्य बेचारा शशि मन हुआ हताश।
तारा मण्डल के कर मोती, तनके छत्र बनाकर तीन, अपना स्वत्व सुरक्षित रखने प्रभु सेवा में है तल्लीन।।
२७. स्वेन प्रपूरित-जगत्त्रय-पिण्डितेन,
कान्ति – प्रताप – यशसामिव संचयेन ।
माणिक्य-हेम-रजत – प्रविनिर्मितेन,
सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि ॥
कान्ति प्रताप सुयश प्रभुवर का फैल गया जग में सारे, आगे स्थान न मिला, हो गए तब पिंडित न्यारे-न्यारे। क्रमशः मानिक, कंचन और रजत के ये घेरे भारी, इन तीनों कोटों से खिलती दिव्य छटा प्रभु की न्यारी।
२८. दिव्यस्त्रजोजिन ! नमत्-त्रिदशाधिपाना-
मुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिबन्धान् ।
पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वा परत्र,
त्वत्संगमे सुमनसो न रमन्त एव ॥
श्रीचरणों में जब सुरेन्द्र झुकता है बन श्रद्धा वाला,
-मुकुट तज, गिरती चरणों में, झट सुमनों की माला।
बिलकुल समुचित काम सुमन माला का मुझको लगता है, शुभ मन वाला जन प्रभु-आश्रय पा क्या कहीं भटकता है।।
२९. त्वं नाथ! जन्म-जलधेर्विपराङ्मुखोऽपि, यत् तारयस्यसुमतो निजपृष्ठलग्नान् । युक्तं हि पार्थिव-निपस्य-सतस्तवैव, चित्रं विभो ! यदसि कर्मविपाकशून्यः ॥
भव-सागर से आप विमुख जब बिल्कुल ही हो विश्वाधार, तब फिर अनुयायी भक्तों को कैसे करते उससे पार। हे पार्थिवनिप ! विस्तृत ज्ञानी! पार्थिवनिप का यही प्रकार, पर वह लिप्त, अलिप्त आप हैं, करते सबका ही उद्धार।।
३०. विश्वेश्वरोऽपि जनपालक ! दुर्गतस्त्वं,
किं वाऽक्षर-प्रकृति-रप्यलिपिस्त्वमीश !
अज्ञानवत्यपि सदैव कथंचिदेव,
ज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्वविकासहेतु ॥
विश्वेश्वर होकर भी दुर्गम तीन लोक में है दुर्जेय, हैं अक्षर-अविनाशी, अलिपिक, कर्म लिप्त नहीं है श्रद्धेय। अज्ञप्राणियों के संरक्षक, यहां न ननुनच लगा कभी,
करते हैं त्रिभुवन आलोकित, यों करते स्वीकार सभी ।।
३१. प्राभार-संभूत-नभांसि रजांसि रोषा
-दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि ।
छावाऽपि तैस्तव न नाथ। हता हताशो ग्रस्तात्वमीभिरयमेवत परं दुरात्मा
होकर क्रुद्ध कमठ शह ने जब प्रभु पर धूलि बरसाई,
नभ भर गया किन्तु प्रभु की छाया भी मलिन न हो पाई। प्रत्युत उसी धुलि से वह खुद ग्रस्त हुआ संत्रस्त हुआ,
हो हताश मन खिन्न बना, अपने पापों से ध्वस्त हुआ आ।।
३२. यदगर्जदूर्जित-घनौघमदभ्र-भीम,
भ्रश्यत्-तडिन्मुसल-मांसल-घोरधारम् ।
दैत्येन मुक्तमध दुस्तरवारि दध्रै,
तेनैव तस्य जिन। दुस्तरवारि कृत्यम् ॥
उमड़-घुमड़ घन गरज रहा था,चपल बिजलियां कौंध रही, महा भयंकर जल की वर्षा की शठ ने ला रोष वहीं।
थाह सलिल का पाना मुश्किल सचमुच दुस्तर थी जलधार,
हुई न प्रभु की हानि जरा भी, उसके लिये बनी तलवार।।
३३.ध्वस्तोरध्व केशाविकृताकृति-मर्त्य-मुण्ड
प्रालम्बभ्रुद-भयद वक्त्रविनिरयदग्नि
प्रेतव्रजः प्रति भवन्तमपीरितो यः,
सोऽस्याऽभवत् प्रतिभवं भवदुःख-हेतुः ॥
बिखरे केश, विकृत आकृति, नरमुंडों को माला गल में, मुख से आग उगलते प्रेत, कमठ प्रेरित आये पल में। किन्तु ध्यान मुद्रा से तुमको तनिक न विचलित कर धाये, बने कमठ को ही दुःखद भव भव में पीड़ा बन छाये।।
३४. धन्यास्त एव भुवनाधिप! ये त्रिसन्ध्य
माराधयन्ति विधिवद् विद्युतान्यकृत्या
भक्त्योल्लसत्-पुलक-पक्ष्मल-देहदेशाः,
पाद-द्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाजः ।।
हे त्रिभुवन के स्वामी। जग में है बस वे ही प्राणी धन्य, जिनके पुलकित रोम-रोम में तेरे प्रति हैं, भक्ति अनन्य। जो त्रिसंध्य में कार्य-मुक्त हो विधिवत् करते तेरा जाप,
उन श्रीचरण सेवकों के मिटते है सारे भव संताप२५.
अस्मिन्न पार-भतवारिनिधौ मुनीश।
मन्ये में श्रवण गोचरतां गतोऽसि ।
आकर्णिते तु तव गोत्र-पवित्र-मंत्रे,
किं वा विपद्-विषधरी सविधं समेति ॥
इस अपार सिन्धु में हुआ भटकते काल अन्नत
किन्तु आपका नाम कभी कानो में पड़ा नहीं भगवन्त
एक बार भी नाम-मंत्र की ध्वनि अगर कानों में आती
तो विपत्ति की काली नागिन पास नहीं आने पाती।।
३६. जन्मान्तरेऽपि तव पादयुगं न देव !
मन्ये मया महितमीहित-दान-दक्षम् ।
तेनेह जन्मनि मुनीश ! पराभवानां
जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम् ॥
पता न कितने जन्म लिए फिर भी मिटा न भव का रोग, क्योंकि न मिल पाया आशा-पूरक इन चरणों का संयोग। इसीलिए तो इस जीवन में गया व्यथाओं से घेरा,
प्रभो! बन गया अनायास हो पराभवों का बस डेरा।।
३७ नूनं च मोह-तिमिराकृत-लोचनेन,
पूर्वं विभोः सकृदपि प्रविलोकितोऽसि ।
ममांविधो विधुरयन्ति हि मामभर्थाः
, प्रौद्यत्प्रबन्ध गतयः कथमन्यथैते ।।
अन्य मोह का गहरा पर्दा मेरी आँखों पर छाया,
एक बार भी दर्शन अब तक इसीलिए कब कर पाया?
यदि दर्शन हो जाते तो ये सारे संकट मिट जाते,
मर्मान्तक पीड़ा देने फिर क्यों अनर्थ दौड़े आते।।
३८. आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि,
नूनं न चेतसि मया विध्रितो ऽसि भक्त्या ।
जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दुःखपात्रं,
यस्मात् क्रियाः प्रतिफलन्ति न भावशून्याः ॥
सुना नाम भी, की उपासना, किये दर्श भी बारम्बार,
वह था सभी दिखावा, किन्तु, न जोड़ सका अन्तर का तार। तब हो तो ये बाह्य क्रियाएं कुछ भी नहीं सुफल लाई, अगर भावना जुड़ जाती तो, पट जाती सारी खाई।।
३९. त्वं नाथ! दुःखिजनवत्सल हे शरण्य!
कारुण्य-पुण्यवसते। वशिनां वरेण्य!
भक्त्या नते मयि महेश! दयां विधाय,
दुःखांकुरोद्दलन – तत्परतां विधेहि ॥
नाथ आप वात्सल्यमूर्ति हैं, शरणागत प्रतिपालक है, करुणा के हैं पावन-मन्दिर, सकल जगत् के मालिक है। मैं विनम्र सेवक हूं स्वामिन! दया दिखाकर सहलाएँ, दुःखों का मूलोच्छेदन करने में तत्परता लाएं।।
४०. निःसंख्य-सार-शरणं शरणं शरण्य-
मासाद्य सादितरिषु – प्रथितावदातम् ।
त्वत्पाद-पंकजमपि प्रणिधानवन्ध्यो,
वध्योऽस्मि चेद् भुवन-पावन ! हा हतोस्मि ॥
चरण-कमल हैं नाथ आपके अतुल आत्म-बल के आस्थान,
दुःखित जन की रक्षा करने वाले, शरणागत के त्राण।
इन चरणों का अवलम्बन पा मैने दिया न पूरा ध्यान, कैसे मैं शुभ फल पाऊंगा इतना बतला दो भगवान् ।।
४१. देवेन्द्रवंद्म! विदिताखिल-वस्तु-सार!
संसार-तारक! विभो ! भुवनाधिनाथ ।
त्रायस्व देव! करुणाहृद! मां पुनीहि
, सीदन्तमद्य भयद व्यसनाम्बुराशेः ॥
देवेन्द्रों से सदा बन्ध हे सकल पदार्थों के ज्ञाता,
हे संसार-सिन्धु के तारक! तीन भुवन के हे त्राता!
रक्षा करें, पुनीत बनाएं दोष सभी चकचूर करें,
मेरी करके रक्षा मुझको पावन आप जरूर करें।।
४२. यद्यस्ति नाथ! भवदंघ्रि सरोरुहाणां,
भक्तेः फलं किमपि सन्तत संचितायाः ।
तन्मे त्वदेक-शरणस्य शरण्य! भूयाः,
स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि ॥
केवल कहलाने भर को ही मैं तो हूं बस तेरा भक्त,
नहीं भक्ति की रीति जानता पर हूं तेरे पर अनुरक्त।
चिर संचित सेवा है मेरी यदि इसका हो कुछ भी फल,
तो जन्मान्तर में भी तू ही स्वामी मिले मुझे निश्चल।।
४३. इत्थं समाहितधियो विधिवज्जिनेन्द्र ।
सान्द्रोल्लसत् पुलक-कंकितागभागाः ।
त्वबिम्ब-निर्मल-मुखाम्बुज-बद्धलक्ष्याः.
ये संस्तवं तव विभो ! रचयन्ति भव्याः ॥
हे जिनेन्द्र ! अविचल श्रद्धा से जो सुस्थिर मति वाले हैं नाम श्रवण कर पुलकित होते अदभुत श्रद्धा वाले हैं।
और सघन उल्लसित भक्ति से रोमांचित तन वाले हैं.
वे ही भव्य मनुज विधि-पूर्वक तव गुण पाने वाले हैं।।
४४. जन नयन – कुमुदचन्द्र !
प्रभास्वराः स्वर्ग-सम्पदो भुक्त्वा ।
ते विगलितमलनिचया,
अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते ॥
भक्त जनों के नेत्र-कुमुद को विकसित करने निर्मल चन्द्र, तेरे सेवक स्वर्ग-सम्पदा के भोक्ता बनते निस्तद्र !
त्रिभुवन नायक!वे आखिर करके सब कर्मों का व्यपनाश, ‘कुमुद चन्द्र’ तत्काल ‘छत्र’ वे शाश्वत सुख में करते वास।।
लय : राधेश्याम