भगवान् श्री वासुपूज्य
तीर्थकर गोत्र का बन्ध
अर्धपुष्कर द्वोप की मंगलावतो नगरी में राजा पद्मोत्तर ने इस तत्त्व को क्षणभर के लिए विस्तृत नहीं किया-संसार अनित्य है। अतुल सम्पत्ति व विपुल भोग सामग्री पाकर भी वे कभी उन्मत्त नहीं हुए। वे सदैव अध्यात्म व आत्म-विकास के बारे में सोचते रहते थे। ज्योंही उन्हें अवकाश मिला, अपने पुत्र को राज्य सौंप कर आचार्य वज्रनाभ के पास दीक्षित हो गए।
साधना में पद्मोत्तर मुनि अत्यधिक सजग थे। विशेष कर्म-निर्जरा के बीस स्थानकों का उन्होंने मनोयोगपूर्वक सेवन किया था। कर्मों की महान् निर्जरा होने से पद्मोत्तर मुनि ने उसी जीवन में तीर्थङ्कर गोत्र का बन्ध किया तथा वहां से समाधिपूर्वक मरकर ‘प्राणत’ देवलोक में देव बने ।
जन्म
देवयोनि भोगकर भगवान् के जीवन ने भरत क्षेत्र की समृद्ध नगरी चम्पा के सम्राट् श्री वसुपूज्य की महारानी जयादेवी की कुक्षि में अवतरण किया। महारानी ने स्वप्न में चौदह महादृश्य देखे । स्वप्न पाठकों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि हमारे घर में तीर्थंकर पैदा होने वाले हैं। सब रोमांचित हो उठे, और प्रभु के जन्म की व्यग्रता से प्रतीक्षा करने लगे।
गर्भकाल पूरा होने पर फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी को मध्य रात्री में बिना किसी बाधा व पीड़ा के भगवान् का जन्म हुआ ।
चौंसठ इन्द्र मिलकर भगवान् के नवजात शरीर को पंडक बन के शिलापट्ट पर ले गए, जन्म-अभिषेक किया, तथा विभिन्न प्रकार से अपना हर्ष प्रकट करके वापिस यथास्थान भगवान् के नवजात शरीर को स्थापित किया।
राजा वसुपूज्य ने पुत्र प्राप्ति की अपार खुशी में दिल खोल कर उत्सव किया। याचकों को दान दिया।
नामकरण के दिन बड़ी संख्या में बुजुर्ग लोग आये थे। बालक को देखकर सबने कहा सम्राट् के सभी गुण इसमें मौजूद हैं। आप अमर रहें, आपका नाम अमर रहे, बालक बाप के नाम को अमर बनाने वाला होता है, अतः हमारा निवेदन है कि बालक का नाम ‘वासुपूज्य’ रखा जाए। आपका नाम वसुपूज्य है तो आपके पुत्र का नाम वासुपूज्य दिया जाए तो बालक के नाम से आपका नाम भी हमें स्मरण होता रहेगा। राजा के नाम जंच गया। उनके शरीर की ऊंचाई सत्तर धनुष्य की थी।
वासुपूज्य कुमार अपने बाल-साथियों के साथ क्रीड़ा करते हुए क्रमशः बड़े होने लगे ।
उनका अत्यन्त सुन्दर संस्थान (शरीर का आकार) व सर्वोत्तम संहनन युवावस्था में और भी अधिक निखर उठा,
और लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। बोलने वाले हैरान थे उनके रूप पर, शरीर के अद्भुत गठन पर। अनेक राजाजों ने राजा वसुपूज्य के पास दूत भेज कर आग्रह किया- आपके पुत्र के साथ मेरी राजकन्या की उपयुक्त जोड़ी है अतः इनके विवाह की स्वीकृति मिलनी चाहिए।
राजा वसुपूज्य धार्मिक वृत्ति के होते हुए भी यह चाहते थे कि साधुत्व से पहले राजकुमार शादी कर ले। उसने वासु-पूज्य कुमार की शादी अनेक राज कन्याजों के साथ आग्रह-पूर्वक कर दी। साथ में यह भी चाहते थे कि कंवर जब राज्य व्यवस्था का संचालन भी करे। किन्तु, राजा जानते थे कि कुंवर की इन दोनों के बारे में ही सर्वथा विरक्ति है। उन्होंने अपने प्यारे राजपुत्र को एक बार एकान्त में बुलाकर कहा, ‘वत्स ! चौदह स्वप्नों के साथ जन्म लेने वाले अब तक
जितने भी तीर्थङ्कर तथा चक्रवर्ती हुए हैं, वे सब विवाहित हुए है। उन्होंने न केवल विवाह किया, राज्य का संचालन भी किया है। भगवान् ऋषभ से लेकर श्रेयांस प्रभु तक के सारे तीर्थकर राजा बने। फिर राज्य के प्रति अभी से तुम्हारी विरक्ति समझ में नहीं आती है। समय पर सारे काम होने चाहिए, विवाह के समय विवाह, राज्य संचालन के समय राज्य न ? संचालन और साधना के समय साधना। क्यों ठोक है
करोगे न राज्य का संचालन ?बासुपूज्य कुमार अब तक मौन थे, किन्तु अब उन्हें बोलना पड़ा। वहुत विनय के साथ अपने सुद्ध विचारों को व्यक्त करते हुए कहा-पिताजी ! राज्य संचालन में साम, दाम दण्ड, भेद का प्रयोग करना ही पड़ता है। जिनके भोगावली कर्म शेष होते हैं उन्हें तो किसी न किसी रूप में राज्य का संचालन आदि कार्य करना ही पड़ता है। उसमें कुछ न कुछ कर्म का बंध ही होता है। मैं ऐसे कर्मों से प्रतिबन्धित नहीं है, अतः राज्य व्यवस्था का भार मैं नहीं लूंगा।
राजा अपने पुत्र के उत्तर से स्वयं निरुत्तर थे। तत्वज्ञ होने के कारण वे गलत दलील दे नहीं सकते थे। अतः बोले-पुत्र ! फिर तुम स्वयं और दुनिया के कल्याण के लिए जैसा उचित समझो वैसा करो। पिता से आज्ञा मिल गई। वासु-पूज्य अपने महल में आए, इधर लौकान्तिक देव भगवान् को प्रतिबोध देने की रस्म निभाने के लिए पहुंच गए। प्रतिबोध दिया, देवों ने मिल कर वर्षीदान की व्यवस्था की। भगवान ने वर्षीदान दिया ।
निर्धारित तिथि, फाल्गुन कृष्णा अमावस्या के दिन छह
सौ राजाओं के साथ वासुपूज्य कुमार ने अभिनिष्क्रमण किया। दीक्षा के दिन आपके चतुर्थ भक्त (उपवास) का तप था।
दूसरे दिन निकटवर्ती शहर महापुर नगर के राजा सुनंद के यहां भगवान् ने परमान्न (क्षीर) से पारणा किया और देवों ने पंच द्रव्य प्रकट करके दान का महत्व प्रदर्शित किया।
भगवान् ने अपने एक मास छद्यस्थ काल में उग्रतम अन्तरंग साधना की। पवित्र जीवन तो उनका पहले से ही था, अब पूर्व संचित कर्मों की क्षय करने में भी उन्होंने विशेष सफलता प्राप्त करली । एक मास के बाद आप पुनः दीक्षा भूमि में पधारे। उसी उद्यान में पाटल वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए आपको क्षपक श्रेणी प्राप्त हुई। गुणस्थानों के सोपान चढ़ते हुए आपने चार घातिक-कों को क्षय किया और सर्वज्ञता प्राप्त की।
देवेन्द्रों ने केवल-महोत्सव किया। इसके बाद प्रभु के अपने प्रथम प्रवचन में ही चार तीर्थ की स्थापना हो चुकी थी। अनेकों व्यक्ति साधना पथ के पथिक बन गए थे।
धर्म-परिवार
केवली ज्ञानीहै छह हजार
गणधर-बासठ (सुभूम आदि)
मनःपयंव ज्ञानी-छह हजार एक सौ
अवधि ज्ञानी -पांच हजार चार सो
चतुर्दश पूर्वी- एक हजार दो सौ
वैक्रिय-लब्धि धारी-दस हजार
चर्चा वादी-चार हजार सात सौ
साधु-बहत्तर हजार
साध्वियां -एक लाख (प्रवर्तिनी धारणी)
श्रावक -दो लाख पन्द्रह हजार
श्राविकाएं-चार लाख छत्तीस हजार
एक छत्र प्रभाव
तीर्थङ्करों के अतिशय भी अपूर्व होती हैं। उनका प्रभाव सब वर्गों पर एकछत्र रहता है। क्या अमीर, क्या गरीव सब पर आपका अमिट प्रभाव था। तत्कालीन मण्डलाधीश छत्र-पति राजाओं पर भी आपका अद्भुत प्रभाव था। इस अवसर्पिणी के दूसरे नारायण अर्धचर्की वासुदेव द्विपृष्ठ भी आपके परम भक्त थे।
भगवान् वासुपूज्य जब अर्धचक्री की नगरी में पधारे, तब उन्होंने सूचना देने वाले को साढ़े बारह करोड़ सोनयों (मुद्रा) का दान दिया था, और स्वयं राजकीय सवारी से भगवान् के दर्शन करने आये थे। धर्म की प्रभावना में उसका विशेष योगदान था। दूसरे बलदेव श्रीविजय ने भी भगवान् के शासन में भागवती दीक्षा स्वीकार की थी। और भी अनेक राजागण आपके चरणों में साधनालीन बन गये थे।
निर्वाण
अपना निर्वाण काल निकट देख कर भगवान् वासुपूज्य चम्पा नगरी पधारे। वहां छह सौ साधुओं के साथ अनशन ग्रहण किया। एक मास के अनशन से समस्त कर्मों के क्षय हो जाने पर आपने आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी के दिन सिद्धत्व को प्राप्त किया था। चौसठ इन्द्रों ने मिलकर निर्वाण महोत्सव किया, भगवान् के शरीर का नीहरण किया। आपका सर्वायु बहत्तर लाख वर्ष का था।
पांच कल्यानक तिथियां –
१. च्यवन – ज्येष्ठ शुक्ला ६
२. जन्म – फाल्गुन कृष्णा १४
३. दीक्षा- फाल्गुन कृष्णा १५
४. कैवल्यप्राप्ति- माघ शुक्ला २
५. निर्वाण – आषाढ़ शुक्ला १४
६कैवल्य वृक्ष -Wild,chinchona tree
७प्रतीक-भैंस
