(लय : नैतिकता की सुर-सरिता)
बदले युग की धारा,
नई दृष्टि हो, नई सृष्टि हो अणुव्रतों के द्वारा
बदले युग की धारा ॥
. मानवीय मूल्यों की रक्षा, अणुव्रत का आशय है, आध्यात्मिकता प्रामाणिकता, उसका अमल हृदय है। हिंसा के इस गहन तिमिर में, अणुव्रत एक उजारा ॥
धार्मिक है, पर नहीं कि नैतिक, बहुत बड़ा विस्मय है, नैतिकता से शून्य धर्म का, यह कैसा अभिनय है ?
इस उलझन का धर्म क्रांति ही, है कमनीय किनारा ॥
मूल्यपरक शिक्षा के युग में, संयम का अंकन हो,
सत्य अहिंसा से आप्लावित, जन-जन का जीवन हो। भोगवाद के चक्रवात से, सहज मिले छुटकारा ॥
व्यक्ति बनेगा स्वस्थ तभी तो, स्वस्थ समाज बनेगा,
सघन स्वार्थ की मुच्छो का, उपचार अणुव्रत देगा,
प्रकटे अब परमार्थ चेतना, उपकृत हो जग सारा ॥
५. करे प्रबल पुरुषार्थ सभी में अभिनव आस्था जागे, जोडे सबके अन्तर मानस को करुणा के धागे ।
‘तुलसी’ मैत्री तंत्र अचल हो, नभ में ज्यों ध्रुवतारा ॥