भिक्षु म्हारै प्रगट्या जी
भिक्षु म्हारै प्रगट्या जी भरत खेतर में। ज्यांरो ध्यान धरूं अंतर में।।
1. देश-देश नां लोक आपनों, समरण कर रह्या उर में।।
2. आप तणी बुध नहीं परशंसा, बहु लोक करै पुर-पुर में।।
३. मंत्राक्षर-सम नाम तुम्हारो, विघ्न मिटै घर-घर में।।
4. जबर उद्योत कियो जशधारी, एह पंचमें अर में।।
5. आप तणां गण में स्थिर पद सूं, वसियै वास अमर में।।
6. आप तणां गण थी ‘उपराठा’, उभय भवे दुख भर में।।
7. सांप्रतकाल स्वाम गण पायो, आयो चिंतामणि कर में।।
8. आप आचारज महा उपगारी, कल्पवृक्ष जिम तर में।।
१. दृढ़ मर्याद बांधी आप वार, सतियां ने मुनिवर में।।
10. उगणीसै गुणतीस बैसाखे, सुद छठ बीदासर में।।
11. भिक्षु भारीमाल ऋपिराय प्रसादे ‘जयजश’ सुख-मंदर में।।