पर्व संवत्सरी मनाते चलो
(तर्ज : जोत से जोत जलाते चलो)
पर्व संवत्सरी मनाते चलो, सबको हृदय से खमाते चलो बैर विरोध भुलाकर सभी, सबको गले से लगाते चलो
पर्व संवत्सरी मनाते जीवन में है द्वेष घृणा का घोर अन्धेरा छाया
मोहमाया की रंगरलियों में जीवन है भटकाया
दीप क्षमा का जलाते चलो, पर्व संवत्सरी मनाते
पाप हटाकर इस जीवन में धर्म कर्म अपनाओ
खामेमि सत्वेजीव का, सबको मंत्र सुनाओ
प्यार के मोती लुटाते चलो, पर्व संवत्सरी मनाते
बैर से बैर शान्त न होता, उल्टे बढ़ता जाता
ईंधन से बढ़ती अग्नि, किन्तु जल से बुझ जाती
झरना क्षमा का बहाते चलो, पर्व संवत्सरी मनाते ….
तृप्ति हुई नदी जिया भरा नहीं, खा-खा मेवा मिठाई
कीर्ति मुनि कहे जप-तप करके, करलो नेक कमाई जीवन की नैया तिराते चलो, पर्व संवत्सरी मनाते
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क्षमा करें और क्षमा मांगलें
क्षमा करें और क्षमा मांगलें, जीत है इसमें हार नहीं।
क्षमा वीर का भूषण है, यह कायर का व्यवहार नहीं। । टेर ।।
जब तक अपने अपराधी को, क्षमा नहीं हम करते हैं, वैर-भाव की जगह हृदय में, प्रेम भाव नहीं भरते हैं। तब तक क्षमा मांगने का भी, हमको है अधिकार नहीं।।
क्षमा ।।।।
क्षमा करें नहीं, क्षमा न मांगे, द्वेष-भाव तब तक रहता, क्षमा-दान देने लेने से, स्नेह-सलिल निशदिन बहता।
तथ्य मनोवैज्ञानिक है यह, मन का सिर्फ विचार नहीं।। क्षमा।। 211
लाख कलामय बात करें, महिनों तक खावे अन्न नहीं,
सुन्दर वस्त्र अलंकारों से भी, प्रभु होते प्रसन्न नहीं।
मोक्ष द्वार तब तक न मिलेगा, मन के मिटे विकार नहीं।। क्षमा। ।3।
देश-देश को जाति-जाति को, व्यक्ति-व्यक्ति को क्षमा करें। अपने अपराधी को ढूंढ-ढूंढ कर क्षमा करें। विश्व-मैत्री का मूल मंत्र यह, केवल शिष्टाचार नहीं।। क्षमा।।4।।