जैन दर्शन का विश्वास आत्मवाद में है ,आत्मा अपनी सत क्रिया से कम कर्म मुक्त होकर परमात्मा बनती है. जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर भगवान अजीत नाथ है, अजीत नाथ ने भी अपने पूर्व जन्म में घोर तपस्या की थी ,सम्राट विमल वाहन के भव में उन्होंने बहुत का विरक्ति का जीवन बिताया था ,महान कर्म निर्जरा करके तीर्थंकर नाम कर्म का बंध किया ओरअंत में अनशन कर विजय नामक अनुतरविमान में गए ,देवत्व का पूर्ण आयु भोगकर भरत क्षेत्र की विनीता नगरी में राजा जितशत्रुके राजमहलमें महारानी विजया देवी की कुक्षी से आप अवतरित हुए.
इस रात्रि में विजया देवी ने 14 स्वप्न देखें, जिस रात्रि में महारानी विजया देवी को 14 महा स्वप्न आए इसी रात्रि में राजा जितशत्रु के छोटे भाई सुमित्र की धर्मपत्नी को भी 14 महा स्वप्न आए, पूछने पर स्वप्न शास्त्रियों ने बताया एक तीर्थंकर और एक चक्रवर्ती का जन्म होना चाहिए
जन्म
माघ शुक्ल अष्टमी के मध्य रात्रि को मंगल बेला में भगवान का जन्म हुआ, राजा ने जन्मोत्सव मनाया सब कैदियों को मुक्त कर दिया गया, 11 दिन तक राजकीय उत्सव मनाया गया, नामकरण के लिए माता विजया देवी ने कहा मै महाराज के साथ द्मुत क्रीडा में विजय पाना चाहती थी, पर हर बार हार जाती थी ,इस बालक के गर्भ में आने के बाद मेरी मनोकामना पूरी हुई ,सम्राट् जितशत्रु ने कहा रिपोर्ट मिली है, वह बहुत ही आश्चर्यजनक है। इन महीनों में शत्रु राज्यों के दिलों में भी यह भावना उत्पन्न हुई है कि महाराजा जितशत्रु अजेय हैं ।
इन्हें जीतना असम्भव है। यद्यपि मैंने युद्ध की तैयारी नहीं की है, तथापि इन शुभ-संकेतों का उत्पन्न होना मैं तो इस बालक का प्रभाव ही मानता हूं। अतः मेरे चिन्तन में बालक का नाम अजितनाथ रखा जाए। गुण-निष्पन्न नाम पर तुरन्त सबकी सहमति मिल गई। छोटे भाई
सुमित्र के पुत्र का नाम ‘सगर’ रखा गया। दोनों को शारीरिक ऊंचाई साढे चार सौ धनुष्य की थी।
विवाह और राज्य
युवावस्था पर वंश परम्परा के अनुसार अनेक राजकन्याओं से दोनों की शादी कर दी गई।
राजकुमार अजितनाथ का मन वासना में लिप्त नहीं था, वे सिर्फ पुण्य-कर्म सम्बन्धी भोगावली भोग रहे थे।
एक बार राजा जितशत्रु के मन में विचार उठा, पुत्र राज्य करने लायक हो गये हैं,
अब शीघ्रातिशीघ्र राज्य छोड़कर साधना में लग जाना चाहिए। इसी निर्णय के साथ अपने छोटे भाई सुमित्र को राज्य का भार उन्हें देना चाहा, किन्तु सुमित्र इनकार हो गए। तब उन्होंने अपने पुत्र अजितनाथ का राज्याभिषेक किया और स्वयं दीक्षित होकर उत्कृष्ट साधना में लग गए।
अजितनाथ के राज्य-संचालन से प्रजा बड़ी सुखी थी । राज्य में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं था। जनता अत्यन्त चैन से जीवनयापन कर रही थी।
दीक्षा-प्रतिबोध
इकहत्तर लाख पूर्व वर्षों तक घर में रहने के बाद जब भोगावली कर्म शेष होने और प्रभु का अर्न्तमन साधना के लिए उद्यत बना जानकर लौकांतिक देव आए, और रस्म के तौर पर प्रभु को प्रतिबोध दिया। प्रत्येक तीर्थंकर वैसे स्वयं बुद्ध होते हैं, किन्तु लौकांतिक देव उन्हें दीक्षा से एक वर्ष पूर्व प्रति-बोध देने आते हैं। उनके आने के बाद ही तीर्थकर वर्षीदान प्रारम्भ करते हैं।
राज्य त्याग और वर्षादान
अजितनाथ ने अपने चाचा के लड़के भाई ‘सगर’ को राज्य-संचालन का भार सौंपा, वर्षीदान प्रारम्भ किया । वर्षीदान की व्यवस्था सदैव देवता ही करते हैं। भरत-क्षेत्र में कहीं पर भी गड़ा हुआ स्वामी-विहीन स्वर्ण निकाल कर उसे जौ के आकार का बनाकर रात्रि में भंडार भर देते हैं। इन स्वर्ण-जवों को ‘सोनईया’ कहा जाता है। सोनईया के एक तरफ तीर्थंकर की माता का नाम तथा दूसरी तरफ पिता का नाम अंकित रहता है। भगवान् दीक्षा से पूर्व उन सोनईयों का दान वर्ष भर प्रतिदिन एक प्रहर तक देते हैं। इसका उद्देश्य जन-साधारण में दीक्षा से पूर्व ही भगवान् का वैशिष्ट्य स्था-पित करना होता है। इस बहाने अनेक परिचित-अपरिचित व्यक्तियों से मिलना भी हो जाता है। इस दान को अमीर-गरीब सभी ग्रहण करते हैं। इसकी सारी व्यवस्था देवों के हाथ मैं रहती है। तीर्थंकर तो सिर्फ परम्परा के निर्वाह के लिए नायक मात्र होते हैं।
दीक्षा
वर्षीदान के बाद भगवान् जब दीक्षा के लिए तत्पर हुए तो राजा सगर ने भगवान् के दीक्षा महोत्सव किये । चौंसठ इंद्र एकत्रित हुए । भगवान् एक हजार अन्य राजा, राजकुमार व प्रजाजनों के साथ दीक्षित हुए । दीक्षा लेते समय भगवान् के बेले का तप था। दूसरे दिन ब्रह्म-दत्त राजा के यहां प्रथम पारणा हुआ ।
दीक्षित होने के बाद भगवान् ने बारह वर्ष तक कठोर तपस्या व उत्कृष्ट साधना की। ग्रामानुग्राम विचरते हुए प्रभु पुनः अयोध्या पधारे। पौष शुक्ला एकादशी के दिन आप ध्यानावस्था में क्षपक श्रेणी चढ़े । घातिक कर्मों को क्षय करके सर्वज्ञता प्राप्त की । देवों ने उत्सव किया, प्रभु ने तीर्थ-स्थापना की । प्रथम देशना में ही साधु-साध्वी, श्रावक और श्राविकायें बड़ी संख्या में हो गये थे ।
प्रभु का परिवार
गणधर -पिच्चाणवे (सिंहसेन आदि) ।
केवल ज्ञानी- बाईस हजार
मनपर्यव ज्ञानी -बारह हजार पांच सौ
अवधि ज्ञानी- नौ हजार चार सौ
चौदह पूर्वधर – तीन हजार आठ सौ
चर्चावादी – बारह हजार चार सौ।
साधु -एक लाख
साध्वी – तीन लाख तीस हजार (प्रवर्तनी फाल्गुनी देवी)
श्रावक- दो लाख अठानवे हजार
श्राविका -पांच लाख पैंतीस हजार ।
सगर को वैराग्य
लाखों लोग अध्यात्म के आलोक से आलोकित हुए । आपके शासन काल में ही आपके भाई सगर चक्रवर्ती बने और एक निमित्त के साथ सब कुछ छोड़कर वे आत्मस्थ बन गए । चक्र-वर्ती सगर के साठ हजार पुत्र थे। अपने पिता के वे परम-भक्त थे। एक बार उन्होंने सोचा, अपने पूज्य पिताश्री को प्रतिदिन नया कुआं खोद कर पानी पिलायेंगे। दूसरे दिन से यह क्रम चालू हो गया । चक्रवर्ती के मूशलरत्न का इस कार्य में प्रयोग किया जाने लगा । मूशलरत्न से कुआं तत्काल खुद जाता था। उस कुएं के पानी को अपने पिता के पीने के लिए प्रस्तुत करते थे ।
एक दिन वे अनजान में किसी नागकुमार देवता के स्थान को खोदने लगे । नागदेव ने इसका विरोध किया, किन्तु सत्ता के उन्माद में किसी ने ध्यान नहीं दिया । प्रत्युत उसकी मखौल उड़ाने लगे । क्षुब्ध नागदेव ने अपने अधिकारी देव के पास उनकी शिकायत की। अधिकारी देव ने उनको चेतावनी दी, वे फिर भी नहीं माने। अधिकारी देव ने क्रुद्ध होकर उस कुएं में से इतने वेग से पानी निकाला कि वे सब एक साथ पानी के प्रवाह में बहकर मर गये ।
सम्राट् सगर की कुल देवी भी इस भवितव्यता को टाल नहीं सकी । वह सगर को समझाने की दृष्टि से बुढ़िया का रूप बनाकर सम्राट् सगर जिधर घूमने गये थे, उधर चिल्ला-चिल्लाकर पुत्र-शोक में रोने लगी। सम्राट् ने उसे धैर्य देने का प्रयत्न किया। इस पर बुढ़िया ने दुःखी स्वर से कहा-जिस पर बीतती है उसे ही पता चलता है। सम्राट् ने कहा- यह तो ठीक ही है। मेरे पर अगर कभी ऐसी बीतेगी, तो मैं धैर्य रखूंगा । बुढ़िया ने तत्काल पूछा- क्या पक्की बात है ?
सम्राट् ने कहा-मेरी वाणी कभी कच्ची नहीं होती । बुढ़िया ते तत्काल देवी के रूप में लौटकर उस दुःखद संवाद को सुनाया ।
सम्राट् को भारी आघात लगा, किन्तु वे उसे पी गये । संसार की नश्वरता उनके सामने साकार हो गई। सम्राट् सगर तत्काल अपने पौत्र भगीरथ को राज्य देकर दीक्षित हो गये । क्रमशः उत्कृष्ट साधना करके मुक्त बने ।
निर्वाण
भगवान् अजितनाथ ने अब अपना निर्वाण निकट देखा तो एक हजार साधुओं के साथ वे सम्मेद शिखर पर पहुंचे। साठ भक्त (एक मास) के अनशन में उन्होंने चैत्र शुक्ला पंचमी के दिन समस्त करम क्षय करके सिद्धत्व को प्राप्त किया ।
भगवान् का सर्वायु ७२ लाख पूर्व का था ।
पांच कल्यानक तिथियां –
१. च्यवन-वैशाख शुक्ला १३
२. जन्म – माघ शुक्ला ८
३. दीक्षा- माघ कृष्णा ६
४. ज्ञानप्राप्ति-पौष कृष्णा ११
५. निर्वाण – चैत्र शुक्ला ५
पशु – हाथी,
पेड़ – खुरसानी इमली (Baobab )
