श्री हनुमान
(तर्ज धरती धोरां री…)
सुण लै बजरंगी – ३
लाग्यो लछमण जी रे बाण,
थांने जाणो जरूरी काम,
कही हनुमत स्यूं यूं राम, सुण…।।
पहली खोई वन में नारी-२,
अब तो जांतो दिसै भाई,
म्हां पर आ कोई विपदा आई।।
म्हां स्यूं पूछ ली जद माई-२,
कठै छोड्यो लछमण भाई,
जास्यु कियां अवधपुर मांही।।
द्रोणागिरी पर बेल बतावै-२,
बा संजीवन नाम कुहावै,
ल्याया लछमण जी बच ज्यावै
हनुमत चरणां शीश नंवायो-२,
सीधी पर्वत ऊपर आयो,
पर वो संजीवन नहीं पायो, सोचे बजरंगी ।।
पर्वत ऊपर देखी माया -२,
मन में क्रोध घणा ही आया,
आखिर पर्वत सहित उठाया, चाल्या बजरंगी।।
हनुमत रूप धरया रण बंका-२,
मेटी रामा दल री शंका,
पहुंच्या दोय घड़ी में लंका, आया बजरंगी।।
ज्यूँ ही दियो संजीवन पान-२,
चेत्या लछमण जी बलवान,
बोल्या रामचन्द्र भगवान सुन लै
थांरो अमर रहवेला नाम २,
जग में रामदूत हनुमान,
गावै “भक्त मंडल” गुणगान सुन लै