आरती
जय जय शासन माता
कृपा नजर पा तेरी, रू रूं खिल जाता।
1 संतों की धरती पर, जन्म हुआ तेरा । संतो की सेवा से जुड़ा रहा नाता।
2. निर्मलता निश्छलता, रग-रग में तेरे। परम तितिक्षा समता, घट घट की ज्ञाता।।
3. विनय विवेक देखकर, अहंकार झुकता। स्वाद कषाय विजेता, शिव सुख सन्धाता ।।
4. कनक कनक है असली, काट नहीं लगता। मंगल पद रखुब सुनते, गण के अंदाता ।।
६. राजहंस मानस के, गुण मुक्ता चुनकर । प्रभा बन गई माला, जन जन जन है गाता।।
6. ज्ञान चरण दर्शन दर्शन की, गंगोतरी बनी।
प्रमुख्या भिक्षु गण में, जीवन निर्माता ।।
7. तुलसी महाप्रज्ञ से, आशीर्वर पाया।
महाश्रमण शासन में, बनी संघ माता ।। 8.
गोल्डन जुबली पर मैं, बलिहारी जाता।
“कमल” भक्ति वंदन कर, चिदानंद पाता।
रचयिता उग्रविहारी तपोमूर्ति मुनि कमलकुमार