मत जाओ नेम कुमार
तर्ज : कर सोला सिणगार, चाली पाणी ने पणिहार….
मित्र – मंडल – कोलकाता
मत जाओ नेम कुमार, राजुल रो रो करे पुकार-२ ।।ध्रुव ।।
उभी झरोखे राजुल सोचे, छोड़ चाल्या बारात, क्यूं थे छोड़ चल्या बारात ।।
रथ ने फेर चल्या थे स्वामी, रे गई मन री बात,
म्हारी रे गई मन री बात।।
मत ना तोड़ो दिल रा तार… राजुल रो रो… ।।१।।
जाता देख्या नेम पिया ने, उड़ग्यो मन रो होश,
म्हारो उड़ग्यौ मन रो होश।
काँई उल्हाणों देवाँ थाँने, कर्मां रो है दोष।
म्हारे कर्मां रो है दोष ।।
म्हाने छोड़ चल्या मझधार… राजुल रो रो…।।२।।
पशुआँ पर तो करुणा कीनी, म्हाने दिया बिसार
, क्यूं थे, म्हाने दिया बिसार।
‘मित्र-मण्डल’ भी केवे थांने, ले चालो गिरनार,
प्रभुजी ले चालो गिरनार ।।
सुणलो अरज आ बारम्बार… राजुल रो रो… ।।३।।