3,Third (Tisare)Tirthankar Bhagwan Shree Sambhav Nath Ki Kahani

3rd Tirthankar Bhagwan Shree Sanbhavnath Ka Symbol ( Pratik)-horse

भगवान् श्री संभवनाथ

महापुरुष कोई एक दिन में नहीं बन जाता । इसके लिए वर्षों नहीं, कई जन्मों तक साधना करनी पड़ती है। भगवान् श्री संभवनाथ के जीव ने भी अनेक भवों में साधना की थी, मान-वीय गुणों का विकास किया था, उसी के परिणामस्वरुप वे तीर्थंकर बने ।
एक बार वे क्षेमपुरी नगरी के विपुलवाहन नामक राजा थे । राज्य में भयंकर दुष्काल पड़ा। राजा में मानवीय-भाव उमड़ पड़े। उसने अपने भंडार के द्वार खोल दिए । अधि-कारियों को निर्देश दिया कि भंडार में भले कुछ भी न बचे, किन्तु राज्य का एक भी व्यक्ति भूखा नहीं रहना चाहिए। राजा ने  देहाती क्षेत्रों का दौरा किया तथा अन्न वितरण की व्यवस्था देखी । राज्य में चल रहे विकास कार्यों की गति-विधि को देखा । राजा के इस आत्मीय व्यवहार से प्रजा में अद्भुत एकात्मकता आ गई ।
राजा को जब वह पता चला कि दुष्काल के करण अनेकों साधु सुदूर जनपद में चले गए हैं, किन्तु कुछ शरीर से अस्वस्थया अक्षम साधु और उनकी परिचर्या करने वाले अभी भी शहर में है, मुनि की चर्या से राजा अपरिचित था, तत्काल मुनि के पास आया, भोजन के लिए निमंत्रण दिया, मुनि ने अपने कल्प-अकरूप की विधि बतलाई । राजा ने निवेदन किया-कोई बात नहीं, राजमहल में अनेक भोजनालयों में सात्त्विक भोजन बनता है, मेरे सहित सभी व्यक्ति कुछ न कुछ कम खाकर आपको देंगे, आप पधारिए । मुनि गए राजमहल से यथोचित आहार ले आए। राजा ने शहर में अन्य संपन्न व्यक्तियों को भी समझाया, वे भी मुनियों को भक्ति से भिक्षा देने लगे । दुष्काल के दिनों में प्रतिदिन राजा संतों को आहार मिला या नहीं, इसकी जानकारी लेता और धर्म-दलाली करता । राजा की इस धर्म-दलाली और शुद्ध-दान से विशिष्ट कर्म-निर्जरा हुई। अपूर्व पुण्य का बंध हुआ ।
राजा के प्रति निष्ठा के भाव प्रजा में स्थायी रूप से जम गए ।
तीर्थकर गोत्र का बन्ध
एक बार राजा विपुलवाहन ने बादलों की घनघोर घटा को हवा के साथ उमड़ते व बिखरते देखा । राजा को संसार व परिवार का स्वरूप भी ऐसा ही छिन्न-भिन्न होने वाला लगा। वे भौतिक जीवन से विरक्त हो गए और स्वयंप्रभआचार्य के पास दीक्षित होकर अध्यात्म में लीन हो गए 
अपनी उदात्त भावना के द्वारा कर्म निर्जरा के बीस विशेष स्थानों की साधना की। अशुभ कर्मों की निर्जरा के साथ तीर्थकर नाम कर्म जैसी शुभ-पुण्य-प्रकृति
का बंध किया । अन्त में समाधिपूर्वक आराधक पद पाकर नौवें देवलोक में देव बने । तिलोयपन्नति आदि ग्रंथों में विपुल-वाहन ग्रैवेयक में गए, ऐसा उल्लेख है।
जन्म
सुखमय देवायु को पूर्णतः भोग लेने के बाद उनका वहां से च्यवन हुआ। भरत क्षेत्र में सावत्थी नगरी के राजा जितारि की पटरानी सेनादेवी की कुक्षि में आप अवतरित हुए । रात्रि में सेनादेवी को तीर्थंकरत्व के सूचक चौदह महास्वप्न आए । रानी ने सम्राट् जितारि को जगाकर स्वप्न बतलाए । हर्षो-न्मत्त राजा ने रानी से कहा कोई भुवन-भास्कर अपने घर में आया है।  अब तुम नींद मत लो, धर्म-जागरण करो। सबेरे में स्वप्नशास्त्रियों से पूछकर इसका वितृस्त ब्यौरा बताऊंगा ।
स्वप्न-पाठकों ने स्वप्न-शास्त्रों व अपने अध्ययन के आधार पर एक मत से यह निर्णय सुनाया कि रानीजी की कुक्षि से पुत्र-रत्न पैदा होगा, लाखों व्यक्तियों को उनसे त्राण मिलेगा ।राजाजी ! आपका नाम इस पुत्र के कारण अमर हो जाएगा। स्वप्न-पाठकों की बात से राजमहल सहित सारे जनपद में खुशी की लहर फैल गई।
गर्भकाल पूरा होने पर महारानी सेनादेवी ने मिगसर शुक्ला चतुदर्शी की मध्य रात्रि में बालक को जन्म दिया। सर्व-प्रथम इन्द्रों ने जन्मोत्सव किया, बाद में राजा जितारि और सावत्थी जनपद के भावुक लोगों ने जन्मोत्सव मनाया । 
नाम
पुत्र के नामकरण के उत्सव में परिवार व राज्य के प्रतिष्ठित नागरिक एकत्रित हुए। उन्होंने बालक को आशीर्वाद दिया। नाम के संबंध में सम्राट जितारि ने बताया कि इस बार राज्य की पैदावार अभूतपूर्व हुई है। इस वर्ष की फसल राज्य के इतिहास में कीर्तिमान है। मैं सोचता हूं कि ऐसी फसल इस बालक के आने के उपलक्ष में ही संभव हो
सकी है। अतः पुत्र का नाम संभवकुमार रखा जाना उपयुक्त होगा।  शारीरिक अवगाहना चार सौ धनुष की थी ।
विवाह और राज्य
अवस्था के साथ संभवकुमार ने यौवन में प्रवेश किया, तब राजा जितारि ने सुयोग्य कन्याओं से विवाह कर दिया  कुछ समय के बाद आग्रहपूर्वक संभवकुमार को सिंहा-सतारूढ़ करके स्वयं निवृत्त बन गए ।
संभवकुमार का मन युवावस्था में भी, राज्यसत्ता व अपार वैभव पाकर भी आसक्त नहीं बना । वे केवल कर्त्तव्य-भाव से राज्य का संचालन करते रहे। उनके शासन काल में राज्य में अद्भुत शांति रही। चारों ओर समृद्धि का वाता-वरण छाया रहा। वे ५६ लाख पूर्व तक घर में रहे।
दीक्षा
भोगावली कर्मों की परिसमाप्ति निकट समझकर भगवान् ने वर्षीदान दिया।  निश्चित तिथि – मिगसर सुदी पूर्णिमा को एक हजार राजा व राजकुमारों के साथ सहस्राम्र वन में आए । पंचमुष्टि लुंचन किया। हजारों लोगों ने देखते-देखते जीवन भर के लिए सावद्य योगों का प्रत्याख्यान किया । चारित्र के साथ ही आपने सप्तम गुणस्थान का स्पर्श किया । उन्हें चौथे मनःपर्यव ज्ञान की प्राप्ति हुई । प्रत्येक तीर्थंकर को दीक्षा के साथ ही चौथा मनःपर्यव ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।
(इस ज्ञान का उपयोग कर वे चाहें तो अढाई द्वीप (जंबू द्वीप, घातकी वह तथा अर्ध पुष्कर द्वीप) में समनस्क प्राणियों के मनोगत भावों की जान सकते हैं।)
दीक्षा के दिन भगवान् के चौविहार बेले का तप था। दूसरे दिन सावत्थी नगरी के राजा सुरेन्द्र के यहां प्रथम पारणा हुआ।
भगवान् संभवनाथ चौदह वर्ष तक मुनि अवस्था में विचरण करते रहे। उन्होंने जितेन्द्रियता के साथ कर्म-बधनों का पूर्णतः सफाया करना प्रारंभ कर दिया। विचरते-विचरते आप पुनः सावत्थी में पधारे, वहीं पर आपनै छद्मस्थ काल का अन्तिम चातुर्मास किया।
साधना करते-करते वहीं पर कार्तिक कृष्णा पंचमी की शुक्ल-ध्यान के साथ भगवान् उच्च-श्रेणी पर आरूढ़ हुए। मोह को क्षय करने के साथ क्षायिक चारित्रवान् बने। अन्तरमुहूर्त में ही शेष तीन घाती करमों का क्षय करके उन्होंने सर्वज्ञता प्राप्त की।
इन्द्रों ने भगवान् का केवल-महोत्सव किया। भगवान् के जन्म व दीक्षा दीक्षाभूमि भूमि के लोगों ने जब भगवान् की सर्वज्ञता सुनी तो सुखद आश्चर्य के साथ उद्यान में दर्शनार्थ उमड़ पड़े। वंदन करके सुर-रचित समवशरण में सारे बैठ गए। भगवान् ने देशना दी। आगार व अणगार दोनों प्रकार की उपासना निरूपित की। प्रथम देशना में चतुर्विध (साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाएं) संघ की स्थापना हो गई।
प्रभु का परिवार
गणधर- एक सौ दो (चारु मुनि आदि)
केवल ज्ञानी- पन्द्रह हजार
अवधि ज्ञानी।  नौ हजार छः सो
मनःपर्यव ज्ञानी। बारह हजार एक सौ पचास
चौदह पूर्वधारी -दो हजार एक सौ पचास
-वैक्रिय लब्धिधारी-उन्नीस हजार आठ सौ। 
चर्चा वादी -बारह हजार
साधु-दो लाख
साध्वी- तीन लाख बत्तीस हजार(प्रवतिनी श्यामादेवी सहित)
(श्राविका-छः लाख बत्तीस हजार
श्रावक- दो लाख तिरानवे हजार
निर्वाण
प्रभु ने आर्य जनपद में दीर्घकाल तक विचरण किया। लाखों भव्य-जनों का उद्धार किया। अन्त में अपना महाप्रयाण निकट समझ कर उन्होंने समेद शिखर पर अनशन कर लिया। चैत्र शुक्ला छठ को शुक्ल-ध्यान के चतुर्थ चरण में पहुंच कर आपने क्रिया-मात्र का विच्छेद कर दिया। अयोगी अवस्था को पाकर उन्होंने शेष अघाती कर्मों को क्षय किया और सिद्धत्व को प्राप्त किया। प्रभु को सर्वायु ६० लाख पूर्व की थी।
पांच कल्यानक तिथियां
१. च्यवन- फाल्गुन शुक्ला ८
२. जन्म-मिगसर शुक्ल्या १४
३. दीक्षा-मिगसर शुक्ला १५
४. ज्ञान प्राप्ति कात्तिक कृष्णा ५
५. निर्वाण चैत्र शुक्ला ६
पेड़ -साल वृक्ष 
पशु-अश्व(घोड़ा)

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