(लय : महावीर मुझे ज्योतित करदो…)
* वीतराग ! भव पार करो
हे वीतराग ! भव पार करो । कण-कण में समता भाव भरो ।।
१. श्री ऋषभ, अजित, संभव स्वामी, है अभिनन्दन अन्तर्यामी । जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व स्मरो,
हे वीतराग। भव पार करो ।।
२. श्री चन्द्र, सुविधि, शीतल सुखकर, श्रेयांस, वासुजिन, विमल प्रवर । योगीश! अनन्त विकार हरो,
हे वीतराग! भव पार करो ।।
३. श्री धर्म, शांति, कुन्थु, अर है, मल्ली, मुनिसुव्रत जिनवर है ।
नमि, नेमिनाथ का ध्यान घरो, हे वीतराग! भव पार करो ।।
४. श्री पार्श्वनाथ, महावीर प्रभो, अरिहन्त सिद्ध आचार्य विभो ।
श्री उपाध्याय, मुनि भार हरो, हे वीतराग! भव पार करो ।।
५. गौतम आदि ग्यारह गणधर, श्री स्थूलिभद्र शासन शेखर ।
जिन-धर्म शुद्ध संस्कार भरो, हे वीतराग ! भव पार करो ।।
६. ब्राह्मी, सुलसा, चन्दनबाला, कौशल्या, जनकसुता, चूला । हे मृगावती कल्याण करो,
हे वीतराग ! भव पार करो ।।
७. कुन्ती, दमयन्ती, प्रभावती, द्रुपदा, पद्मावती, शिवासती । सब राजीमती का नाम स्मरो,
हे वीतराग! भव पार करो ।।
८. है सती सुभद्रा, सुखकारी, श्री रिषभसुता सबको प्यारी । सोलह सतियां भव ताप हरो,
हे वीतराग ! भव पार करो ।।
९. भिक्षु, भारी, रिषि, जीतगणी, मघ, माणिक, डालिम, कालूगणी । तुलसी, महाप्रज्ञ का जाप करो,
हे वीतराग। भव पार करो ।।
रचयिता : साध्वी राजीमतीजी