23,Tevis Ve Tirthankar Bhagwan Parshvnath Ki Kahani

23 veTirthnkar Shree Parshvnath Ka Symbol (प्रतीक-)Snake
भगवान् श्री पार्श्वनाथ
तीर्थकर गोत्र का बंध
पूर्व महाविदेह में राजा कुलिसबाहु की धर्मपत्नी सुदर्शना को एकदा रात्रि में चौदह स्वप्न आये। महारानी जागृत होते ही रोमांचित हो उठी। राजा को जगाकर उसने सारा घटना-क्रम बतलाया। हर्ष विभोर राजा ने कहा-रानी, हमें तो प्रतीक्षा केवल एक पुत्र की थी, किन्तु हमारे राजमहल में तो कोई इतिहास-पुरुष पैदा होने वाला है।
गर्भकाल पूरा होने पर पुत्रका जन्म हुआ। राजा ने जन्मो-त्सव किया तथा पुत्र का नाम स्वर्णबाहु रखा। स्वर्णबाहु जब पढ़-लिखकर तैयार हुआ तब राजा कुलिसबाहु ने उसको आदेश दिया- अब तुम्हें थोड़ा प्रशासन का अनुभव भी प्राप्त करना चाहिए ।  स्वर्ण बाहू अश्व पर बैठ कर घूमने गया अश्व बेकाबू हो गया। वह कुमार को गहन जंगलों में ले गया। गाल्व ऋषि के आश्रम के पास घोड़ा थक कर ठहर गया। कुमार उतरा, आसपास घूमने लगा। उसने आश्रम के निकट एक लताकुंज में कुछ कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा। उनमें एक कन्या विशेष रूपवती एवं लावण्यवती थी। देखते ही कुमार उस सुन्दरी पर आसक्त हो गया, वह उसके रूप को टकटकी लगाकर देखने लगा। उसका नाम पद्मा था ।
कन्या के ललाट पर चन्दन आदि विशेष सुगन्धित द्रव्यों का विलेपन किया हुआ था। उनकी गंध से आकर्षित होकर पास के झुरमुटों में से भ्रमरों का झुण्ड कन्या पर मंडराने लगे। कन्या के कई बार हाथ से दूर करने पर भी भ्रमर ललाट पर आ-आकर गिर रहे थे। सहसा भय-त्रस्त कन्या चिल्लाई, शेष लड़कियां भी भयभीत हो गई। कुमार ने अवसर देखकर अपने उत्तरीय से भंवरों को हटाया। कुमार द्वारा अयाचित सहायता करने से सभी कन्यायें उसकी ओर आकर्षित हुई, परिचय पूछा-कुमार ने अपना नाम तथा परिचय दिया। परिचय पाकर सभी प्रफुल्लित हो उठी। उनमें से एक युवती बोली- “राजकुंवर ! हम धन्य हैं, आज हमें जिनकी प्रतीक्षा थी, वे हमें मिल गये हैं। आज हो प्रातः राजमाता रलावली के पूछने पर गाल्व ऋषि ने कहा था-पद्मा भाग्यशालिनी है, आज स्वर्णबाहु  नामक राजकुमार आयेगा, और वहीं इनका पति होगा । स्वर्णबाहु साधारण राजकुमार नहीं है, कुछ समय में चक्रवर्ती सम्राट् बनेगा।
राजकुमार को कन्या का परिचय देती हुई युवती बोली-यह राजा खेचरेन्द्र की पुत्री पद्मा है. हम सब इनकी सहेलियों हैं। राजा के शरीरांत के पश्चात् महारानी पद्मा की सुरक्षा की दृष्टि से आजकल आश्रम में रहती हैं। वह यह सब बता ही रही थी कि इतने में गाल्व ऋषि और रानी रत्नावली वहीं आ गए। उन्होंने आग्रहपूर्वक कुंवर के साथ राजकुमारी पद्या का गंधर्व विवाह कर दिया ।
पीछे से सेना के सैनिक कुमार को खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे। कुमार को वहां पत्नी सहित देखकर वे विस्मित होउठे
स्वर्णबाहु अपनी पत्नी पद्मा को लेकर अपने नगर पहुंचा। राजा कुलिसबाहु भी पुत्रवधू को देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुए। विवाह के उत्सव के साथ उन्होंने पुत्र का राज्याभिषेक भी कर दिया। राजा स्वयं साधना-पथ पर अग्रसर हो गये।
कालान्तर में स्वर्णबाहु की आयुधशाला में चक्ररत्न
उत्पन हुजा । उससे अनेक देश विजित कर वे सार्वभौम चक्रवर्ती बने ।  एकदा वे तीर्थङ्कर जगन्नाथ के समवशरण में दर्शनार्थ गये। समवसरण में प्रवेश करते हो उन्हें जातिस्मरण जान हो गया। अपना पूर्वभव देखते ही उन्होंने विरक्त होकर पुत्र को राज्य-सौंपा तथा स्वयं जिन चरणों में दीक्षित होकर साधनामय जीवन बिनाने लगे ।
उग्र-तपस्या तथा ध्यान-साधना से उन्होंने महान् कर्म-निर्जरा की। तीर्थकंर गोत्र का बन्ध किया। एक बार वे जंगल में कायोत्सर्ग कर रहे थे, तभी एक सिंह उधर से आ निकला। मुनि को देखते ही क्रुद्ध होकर वह उन पर झपटा। मुनि ने अपना अन्त समय में निकट देखकर अनशन कर लिया तथा समाधिपूर्वक मरण प्राप्त कर महाप्रभ विमान में सर्वाधिक ऋद्धि वाले देव बने ।
जन्म
परम सुखमय देव-आयु भोगकर वे इसी भरत क्षेत्र की वाराणसी के नरेश अश्वसेन की महारानी वामादेवी की पवित्र कुक्षि में अवतरित हुए। चौदह महास्वप्नों से सभी जान गये कि हमारे राज्य में तीर्थङ्कर पैदा होंगे। सर्वत्र हर्ष का बातावरण छा गया । सब अवतरण की प्रतीक्षा करने लगे ।
गर्भकाल पूरा होने पर पौष कृष्णा दशमी की मध्य रात्रि में भगवान् का सुखद प्रसव हुआ। देवेन्द्रों के उत्सव के बाद राजा अश्वसेन नै राज्य भर में जन्मोत्सव का विशेष आयोजन किया। पुत्र जन्म की खुशी का लाभ राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को मिला। उत्सव के दिनों में कर-लगान आदि सर्वथा समाप्त कर दिये गये। बंदी-गृह खाली कर दिये गये और याचकों कोअयाचक बना दिया गया।
नाम के दिन विराट प्रीतिभोज रखा गया। नाम देने की चर्चा में राजा अश्वसेन ने कहा- इसके गर्भकाल में एक बार मैं रानी के साथ उपवन में रहा। वहां अंधेरी रात्रि में एक कालिन्दर सर्प आ निकला। काली रात और काला नाग, कैसे दृष्टिगत हो ? फिर भी पाश्र्व में चलता हुआ सर्प रानी को दिखाई दे गया। वह मुझे जगाकर वहां से अन्यत्र ले गई। तभी मैं जीवित बच सका । मेरी दृष्टि में यह गर्भ का ही प्रभाव था, अतः बालक का नाम पार्श्वकुमार रखा जाये। सभी ने बालक को इसी नाम से पुकारा।
विवाह
तारुण्य में प्रवेश करते ही पार्श्वकुमार के सुगठित शरीर में अपूर्व सौन्दर्य निखर आया। उनके सौन्दर्य को चर्चा दूर-दूर तक फैल गई।
कुशस्थलपुर नरेश प्रसेनजित को पुत्री राजकुमारी प्रभा-वती ने पाश्र्वकुमार के रूप-सौंदर्य का बखान सुनकर मन ही मन प्रतिज्ञा कर ली कि मेरे इस जन्म के पति पार्श्र्वकुमार ही हैं। विश्व के शेष युवक मेरे भाई के समान है। माता-पिता भी इस प्रतिज्ञा को सुनकर प्रसन्न हुए। वे जल्दी ही अपने मंत्री को बाराणसी भेजने वाले थे कि उन्हीं दिनों कलिंग का युवा नरेश यवन प्रभावती के सौंदर्य की चर्चा सुनकर उससे विवाह के लिए आतुर हो उठा। किन्तु जब उसे प्रभावती को प्रतिज्ञा का पता चला तो रुष्ट होकर बोला- कौन होता है पार्श्र्वकुमार ? मेरे होते हुए प्रभावती से कोई भी विवाह नहीं कर सकता । उसने तत्काल ससैन्य कुशस्थलपुर को घेर लिया तथा राजा प्रसेनजित से कहलवाया-या तो प्रभावती को दे दो
या फिर युद्ध करो।
प्रसेनजित धर्मसंकट में पड़ गया। कन्या की इच्छा के विरुद्ध उसका विवाह कैसे किया जाय ? युद्ध करना भी आसान नहीं है। प्रसेनजित ने एक दूत वाराणसी भेजा तथा राजा अश्वसेन के समक्ष सारी स्थिति रखी। । दूत से जानकारी मिलने पर अश्वसेन ने क्रुद्ध होकर सेना को तैयार होने का आदेश दे दिया। पार्श्वकुमार भी रणभेरी सुनकर पिताजी के पास आये और स्वयं के युद्ध में जाने की इच्छा प्रकट की। अश्वसेन ने पुत्र का सामर्थ्य देखकर सहर्ष उसे जाने की अनुमति दे दी। इधर शक्रेन्द्र ने अपने सारथी को शस्त्र आदि से सज्जित रथ देकर पार्श्वकुमार की सेवा में भेजा। देव-सारथी ने उपस्थित होकर पार्श्व को नमस्कार किया और इन्द्र द्वारा भेजे गये रथ पर बैठकर युद्ध में पधारने की प्रार्थना की। पार्श्वकुमार उसी रथ में बैठकर कुशस्थलपुर की तरफ चले। चतुरंगिणी सेना उनके पीछे-पीछे जमीन पर चल रही थी।
वाराणसी से प्रस्थान करते ही पारर्वकुमार ने एक दूत यवनराज के पास भेजा। उसने यवनराज से जाकर कहा-राजन ! परम कृपालु देवेन्द्र पूज्य पार्श्वकुमार ने आपसे कहलवाया है कि कुशस्थलपुर नरेश ने अश्वसेन राजा की शरण ग्रहण की है; अतः कुशस्थलपुर का घेरा खत्म करो, अन्यथा आपकी कुशल नहीं है। उत्तेजित यवन राजा ने प्रत्युत्तर में दूत से कहा-ओ दूत ! तुम्हारे दूधमुंहे पार्श्वकुमार से कहो कि वह इस युद्धाग्नि से दूर रहे अन्यथा असमय में ही वह मारा जायेगा ।
दूत लौट गया। पाश्र्वकुमार ने उसे दुबारा भेजा । वापिस
जाकर उसने वही बात यवत राजा से कही। दूत की बात सुनकर पास में बैठे कुछ दरबारी उत्तेजित हो उठे; किन्तु वृद्ध मंत्री ने उन्हें शांत करते हुए कहा- पार्श्र्व कुमार की महिमा हम अन्य सूत्रों से भी सुन चुके है, देवेंद्र उनकी सेवा करते हैं, फिर जान-बूझकर हम पर्वत से क्यों टकरायें ? देवों को जीत सकें, यह हमारे लिए सम्भव नहीं है। हमें अपनी सेना और इज्जत को नहीं गंवाना चाहिए। यवन राजा के यह बात जंच गई। देवेन्द्र द्वारा प्रदत्त गगनगामी रथ का भी उस पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने तुरन्त युद्ध का विचार त्याग दिया, और पार्श्र्व के सन्मुख जाकर सेवा साधने लगा।
राजा प्रसेनजित ने जब सेना से मुक्त नगर को देखा तो वह हर्ष विभोर हो उठा। उसने राजकुमार पाश्रर्व की अगवानी की, तथा नम्रतापूर्वक प्रार्थना की “राजकुमार ! राज्य का संकट तुमने समाप्त किया है तो फिर प्रभावती की इच्छा भी पूरी करो, इससे विवाह करके इसकी प्रतिज्ञा भी अब आप ही पूरी कर सकते हैं।”
पार्श्वकुमार ने मधुरता से कहा- मुझे आपके राज्य का संकट समाप्त करना था, कर दिया। शादी के लिए मैं नहीं आया। अतः उसके बारे में कैसे सोच सकता हूँ ? पार्श्र्वकुमार ने वाराणसी की ओर प्रस्थान कर दिया, साथ में यवनराज व प्रसेनजित दोनों राजा भी थे। वहां जाकर प्रसेनजित ने महाराज अश्वसेन से आग्रह किया। अश्वसेन ने कहा- “मैं भी चाहता हूं कि यह शादी करे, किंतु यह इतना विरक्त है कि मैं कह ही नहीं सकता। किसी भी समय यह कोई भी कदम उठा सकता है। फिर भी, प्रभावती की प्रतिज्ञा तो पूर्ण करनी ही है।
राजा ने पार्श्र्वकुमार को किसी तरह से समझा-बुझाकर उनका विवाह कर दिया। पिता के आग्रह से उन्होंने शादी तो की, किन्तु राजा का पद स्वीकार नहीं किया, इसलिए के पाश्र्वनाथ न कहलाकर पार्श्वकुमार ही कहलाये।
नाग का उद्धार
पार्श्र्वकुमार एक बार महल से नगर का निरीक्षण कर रहे थे। उन्होंने देखा कि नागरिकों की अपार भीड़ एक ही दिशा में जा रही है। अनुचर से पता लगा-उद्यान में कमठ नामक एक घोर तपस्वी आये हुए है। पंचाग्नि तपते हैं, लोग उन्हीं के दर्शनार्थ जा रहे हैं। कुतूहलवश पार्श्र्वकुमार भी वहां गये, अग्नि ज्वाला आकाश को छू रही थी, बड़े-बड़े लकड़े जल रहे थे। पार्श्व ने अवधि-ज्ञान से जलते हुए लकड़ों में एक नाग-दम्पती को देखा। उन्होंने तत्काल तपस्वी से कहा-
 धर्म तो अहिंसा में है, अहिसा विहीन धर्म कैसा? तुम जो पंचाग्नि तप रहे हो इसमें तो एक नाग और एक नागिनी जल रही हैं। तपस्वी के प्रतिकार करने पर पार्श्र्व ने लक्कड़ को चिरवाया। उसमें से जलते हुए नाग दम्पती बाहर आकर तड़पड़ाने लगे। पाश्र्व ने उन्हें नमस्कार महामंत्र सुनवाया तथा तपस्वी पर क्रोध नहीं करने की सलाह दी। उसी समय दोनों के प्राण छूट गये। मर कर वे नागकुमार देवों के इन्द्र व इन्द्राणी-धरणेन्द्र व पद्मावती के नाम से उत्पन्न हुए।
तापस का प्रभाव घट गया। चारों ओर उसका तिरस्कार होने लगा। उसने भी क्रूद्ध होकर अनशन कर लिया। मरकर वह मेघमाली देवता बना ।
दीक्षा
भोगावली कर्मों के परिपाक की परिसमाप्ति पर भगवान् पार्श्व दीक्षा के लिये उद्यत बने। लोकांतिक देवों ने आकर उनसे जन-कल्याण के लिये निवेदन किया। वर्षीदान देकर पौष कृष्णा एकादशी के दिन भगवान् ने तीन सौ व्यक्तियों के साथ वाराणसी के आश्रमपद उद्यान में पंच मुष्टि लोच किया। देव और मनुष्यों की भारी भीड़ के बीच सावद्म योगों का सर्वथा त्याग किया। उस दिन प्रभु के अट्टम तप (तेला) था। दूसरे दिन उद्यान से बिहार कर कोपकटक सन्निवेश में पधारे, जहां धन्य गाथापति के यहां परमान्न से पारणा किया। देवीं ने देवन्दु दुभि द्वारा दान का महत्त्व बताया।
उपसर्ग
भगवान् अब वैदेह बनकर विचरने लगे। अभिग्रह युक्तः साधना में संलग्न हुए। विचरते-विचरते आप शिवपुरी नगरी में पधारे। वहां कोशावन में हो गये। कुछ समय बाद प्रभु वहां से बिहार कर आगे तापसाश्रम में पहुंचे तथा वहीं पर वट वृक्ष के नीचे ध्यान मुद्रा में खड़े हो गये।
इधर’ कमठ ‘तापस ने देव होने के बाद-दर्शन से भगवान् पार्श्र्व को देखा। देखते ही पूर्व जन्म का वैर जाग पड़ा। भगवान को देने के लिए वहीं जा पहुंचा। पहले ती उसने शेर, चीता, ब्याघ ,विषधर आदि के रूप बनाकर भगवान् को कष्ट दिये। किन्तु प्रभु मेरू भांति अडीग बने रहे। अपनी विफलता से देव और अधिक उग्र हो उठा। उसने मैघ की विकूरवणि की, देखते-देखते मुसलाधार पानी पड़ने लगा। भगवान् पार्श्व के चारों और पानी बढ़ने लगा। बड़ता-बढ़ता घुटने, कमर, छाती को पार करता हुआ नासा पहुंच गया। फिर भी प्रभु अडीग थे। तमी धरमणेन्द्र का आसन कंपित हुवा। अवधि ज्ञान से उसने भगवान् को पानी में खड़े देखा। सेवा के लिये तत्काल दौड़ बाया। वन्दन करते उसने प्रभु के पैरों के नीचे एक विशाल नाल वाला पथ (कमल) बनाया, भगवान् के ऊपर स्वयं ने सात फणों वाला सर्प बन कर छत्र और कर दिया। प्रभु के तो समभाव था न कमठ पर रोष और न धरणेन्द्र पर अनुराग । कमठासुर देव, फिर भी बारिश करता रहा। धरणेन्द्र ने फटकार कर कमठ से कहा-रे दुष्ट ! अब भी तू अपनी दृष्टता नहीं छोड़ता ? प्रभु तो समता में लीन हैं और तू अधमता के गर्त में गिरता ही जा रहा है !
धरणेन्द्र की फटकार से कमठ भयभीत हुआ। अपनी माया समेट कर प्रभु से क्षमा याचना करता हुआ चला गया ।
उपसर्ग शान्त होने पर धरणेन्द्र भी भगवान को स्तुति कर लौट गया।
केवल ज्ञान
भगवान् ने तयासी राते इसी प्रकार अभिग्रह और ध्यान में बिताई। चौरासीवें दिन आश्रम पद उद्मान में धातकी वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुये छपक श्रेणी लीऔर घाति करमो को क्षय कर केवलत्व को प्राप्त किया।
देवेन्द्रों ने केवल-महोत्सव किया। समवारण की रचना की। वाराणसी के हजारों लोग सर्वज्ञ भगवान् के दर्शनार्थ जा पहुंचे। प्रभु ने प्रवचन दिया। उनके प्रथम प्रवचन में ही तीर्थ की स्थापना हो गई। अनेक व्यक्तियों ने आगार व अणगार धर्म स्वीकार किए।
चातुर्याम धर्म 
चातुर्याम धर्म-अहिंसा, सत्य अचौर्य, अपरिग्रह का निरु पण सर्व प्रथम भगवान् अजितनाथ ने किया था। भगवान् पार्श्र्वनाथ तो इसके अंतिम निरूपक थे। इनके पश्चात् भगवान् महावीर ने पांच महाव्रत धर्म की व्याख्या दी थी। अतः पार्श्र्वनाथ का धर्म ‘चातुर्याम-धर्म के नाम ने प्रसिद्ध हो गया। चौबीस तीर्थकरों में प्रथम और अन्तिम तीर्थकर पांच महाव्रत रूप संयम धर्म का प्रवर्तन करते हैं। शेष चौवीस तीर्थ कंर चातुर्याम धर्म के प्ररूपक होते हैं। ‘चातुर्याम’ और ‘पंचयाम भो शब्द-भेद ही हैं। साधना दोनों को समान है। चातुर्याम धर्म में बह्मचर्य को पृथक याम (महाव्रत) नहीं माना गया, किन्तु ब्रह्मचर्य को अपरिग्रह के अन्तर्गत से लिया गया। 
अपरिग्रह में ब्रह्मचर्य सहज ही आ जाता है। चातुर्याम धर्म का विकास ही पंचयाम धर्म है।
प्रभु का परिवार
गण धर -आठ
केवल ज्ञानी -एक हजार
मनः पर्यव ज्ञानी -साढ़े सात सौ
अवधिज्ञानी – एक हजार चार सौ
चतुदर्शपूर्वी – साढ़े तीन सौ
चर्चा वादी – छः सौ
साधु -सोलह हजार
साध्वियां -अड़तीस हजार
श्रावक- एक लाख चौसठ हजार
श्राविकाएं – तीन लाख सतावीस हजार
अप्रतिहत प्रभाव
भगवान् पार्श्व का प्रभाव मिश्र, ईरान, साइबेरिया, अफ गानिस्तान आदि सुदूर देशों में भी गहरा था । तद्युगीन राजा तथा जनता पार्श्व के धर्म की उपासना विशेष रूप से करते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने जब उन प्रदेशों की यात्रा की थी तो वहां उसने अनेक निर्ग्रन्थ मुनियों को देखा था। महात्मा बुद्ध का काका स्वयं भगवान् पार्श्वनाथ का श्रमणोपासक था। दक्षिण में भी पार्श्व के अनुयायी पर्याप्त मात्रा में थे।
करकंडू आदि चार प्रत्येकबुद्ध राजा भी भगवान् पार्श्व के शिष्य बने थे। कई इतिहासकार तो यह भी मानते हैं कि महात्मा बुद्ध ने छः वर्ष तक भगवान् पार्श्व के धर्म शासन में साधना की थी। उस समय के सभी धर्म-सम्प्रदायों पर पार्श्रव की साधना-पद्धति का विशेष प्रभाव था।
निर्वाण
सत्तर वर्ष तक भगवान् साधना करते रहे। विभिन प्रदेशों की पदयात्रा करके उन्होंने लाखों-लाखों लोगों को मार्गदर्शन दिया। अंत में वाराणसी से आमल-कल्पा आदि विभिन्न नगर सन्निवेशों में होते हुये आप सम्मेदशिखर पर पधारे। तैंतीस चर्मशरीरी मुनियों के साथ अंतिम अनशन किया। एक मास के अनशन में श्रावण शुक्ला अष्टमी के दिन चार अधाती-कर्मों का क्षय कर निर्वाण को प्राप्त किया।
देवों ने, इन्द्रों ने, मनुष्यों ने तथा विभिन्न देशों के राजाओं नै मिलकर भगवान् के शरीर की निहरण क्रिया की।
पांच कल्यानक तिथियां-
१. च्यवन। चैत्र कृष्णा ४
२. जन्म – पौष कृष्णा १०
३. दीक्षा  -पौष कृष्णा ११
४. कैवल्य-प्राप्ति। चैत्र कृष्णा ४
५. निर्वाण।-श्रावण शुक्ला ८
६केवल्य वृक्ष -Fire Flame bush
७ प्रतीक -Snake
(तीर्थंकर Charitra se Sabhar)
 

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