रोशनी पाके गुरुवर से ज्ञान सूरज उगाया था
गुरु में तुम, तुम्हारे में गुरुका दिल समाया था
घोर कलिकाल में उंचाइया देदी समर्पण को
बने महाप्रज्ञ नथमल से स्वयं गुरु ने बनाया था…
ओ दशमे दिव्य दिवाकर गुरु महाप्रज्ञ रत्नाकर ओहोहो
कैसी भक्ति दिखाई, दिव्य शक्ति है पाई दियातेज संघ को समर्पण बोलता है, मधुर रस घोलता है
हमें भी सीखना है, यही तो तेरी देशना है। ओSS
① शुरू किया देख गुरुका मन पावन आगम संपादन जैनजन है कृतज्ञ, बोले जय महाप्रज्ञ संवारी वीर वाचना
① जैनो की ध्यान प्रणाली कोई कर न सका रखवाली कर सघन संधान, नाम दिया प्रेक्षाध्यान
जागी ध्यान चेतना
① शिक्षा की कल्मष काया ओहोहो
जीवन विज्ञान बनाया- ओऽऽऽ
चले प्रायोगिक प्रशिक्षण, निखरजाये तनमन और भावना
① अहिंसा यात्रा सबकी – हो हो हो हो
नहीं किसी कोम मजहब की हो होहोहो
तेरी करुणाकी धारा प्यासो को मिला किनारा
जगत की हितकामना
अनगिन अवदान तुम्हारे होहोहोहो
हम ऋणी रहेंगे सारे होहोहोहो
तुलसी की सदी मनाये, प्रतिबिम्ब तुम्हारा आ आये
वीर गौतम सी शासना 2
तुम सिद्धिपीठ शिवालय हो हो हो हो
तुम प्रज्ञापुरुष हिमालय, तेरा जाना ना सुहाये
बार-२ याद आयै पुनः संभालना