भगवान् श्री चंद्रप्रभ प्रभु
तीर्थकर गोत्र का बंध
अनेक जन्मों की सत्क्रिया के फलस्वरूप धातकी खंड की मंगलावती नगरी के राजा पद्म के भव में धर्म-प्रेरणा का अच्छा योग मिला था। शहर में साधुओं का आना जाना प्रायः रहता था। धर्म की प्रेरणा सामान्यतः धर्मगुरु सापेक्ष ही होती है। वे जिस ग्राम, नगर में जाते हैं, वहीं पर धर्म की गंगा प्रवाहित रहती है। धर्म गुरुओं के अभाव में धर्म प्रेरणा भी लुप्त हो जाती है, फिर सामूहिक साधना दुरूह बन जाती है। मंगलावती के लोग इस विषय में भाग्यशाली थे। उन्हें साधु-संतों की सतत प्रेरणा मिलती रहती थी ।
युगंधर मुनि के पास राजा पद्म दीक्षित हुआ। वह तपस्या के साथ व्यैयावृत्य भी करने लगा। बीस स्थानों को विशेष साधना की। पूर्वकृत कर्मों को क्षय किया। तीर्थंकर गोत्र का बंध किया। अंत में अनशनपूर्वक आराधक पद पाकर अनुत्तर लोक के विजय विमान में उसने देवत्व प्राप्त किया ।
जन्म
देवत्व का आयुष्य पूर्ण भोगने के बाद भगवान् चंद्रप्रभ
का जीव स्वर्ग से च्यवन- कर चंद्रपुरी के राजा महासेन की रानी सुलक्षणा देवी की पवित्र कुक्षि में अवतरित हुआ । माता सुलक्षणा ने चौदह महास्वप्न देखे सवेरे स्वपन पाठकों से जाना कि हमारे यहां तीर्थंकर अवतरित हुए है। महारानी गर्भावस्था में पूर्ण संयम बरतने लगी थी। उसने अपना खाना, पीना, बोलना तथा उठना-बैठना आदि संयम पूर्वक करना प्रारम्भ कर दिया । ज्यादा हंसना ज्यादा बोलना, तेज बोलना, गुस्सा करना, प्रयत्नपूर्वक बंद कर दिया था। अति मीठा, अति चरचरा भोजन भी सर्वथा छोड़ दिया था।
इस प्रकार सजगता पूर्वक प्रतिपालना करते हुए गर्भकाल पूरा हुआ। पौष कृष्णा एकादशी की रात्रि में भगवान् का मंगलमय प्रःसव हुआ । प्रःसव की पुनीत बेला में चौंसठ इंद्रों ने एकत्रित होकर उत्सव मनाया। सुमेरू पर्वत पर पांडुक वन में वे शिशु को ले गए, उसके नवजात शरीर पर जलाभिषेक किया गया। अभिषेक के बाद वापिस माता की गोद में लाकर स्थापित कर दिया।
राजा महासेन को पुत्र जन्म की जब बधाई मिली तब बधाई देने वालों को राजा ने राज्य चिन्ह के अतिरिक्त शरोर पर से सारे बहुमुल्य आभूषण उतार कर प्रदान कर दिये। राज्य भर में पुत्र का जन्मोत्सव मनाया गया। ग्यारह दिनों तक राजा ने याचकों के लिए भंडार खोल दिया। जो आया उसे ही दिल खोलकर दान दिया। राजा की इस अप्रत्याशित उदारवृत्ति से लोग विस्मित थे ।
नामकरण उत्सव पर भी दूर-दूर से लोग आए । निश्चित समय पर पुत्र को लेकर माता सुलक्षणा आयोजन स्थल पर बाई। ने लोगों ने बालक को देखा तो स्तब्ध रह गए, मानों चंद्रमा आकाश से उतर आया हो। नामकरण की चर्चा में गर्भकाल की विशेष घटना के विषय में पूछा गया तो राजा महासेन ने कहा- इसके गर्भकाल में महारानी को चंद्रमा को पीने का दोहद (इच्छा) उत्पन्न हुआ था, जिसे मैंने पूर्ण किया। बालक के शरीर की प्रभा भी चन्द्र जैसी है, अतः बालक का नाम चन्द्रप्रभ ही रखा जाए। उपस्थित जन-समूह ने भी उसी नाम से बालक को पुकारा। भगवान् चन्द्रप्रभ के शरीर की ऊंचाई १५० धनुष्य की थी। उन्होंने आयुष्य १० लाख पूर्व का प्राप्त किया था।
विवाह और राज्य
त्रि-ज्ञान (मति, श्रुति, अवधि) धारी चंद्रप्रभ को गुरुकुल में शिक्षा की अपेक्षा नहीं थी। कोई भी तीर्थंकर गुरुकुल में नहीं पढ़ते । वे सब विज्ञानज्ञ होते हैं। भोग समर्थ होते ही माता-पिता ने अनेक राज-कन्याओं से चंद्रप्रभ कुंवर का विवाह कर दिया। राजा महासेन ने अपनी निवृत्ति का अवसर समझकर राज्य संचालन का दायित्व चंद्रप्रभ को सौंपा और स्वयं निवृत्त हो गये। साधना-पथ के पथिक बन गए ।
सम्राट् चंदप्रभ ने अपने जनपद का कुशलता से संचालन किया। उनके राज्यकाल में समुद्धि सदैव वृद्धिगत रही। जन-पद पहले से भी अधिक समृद्ध व बाहरी खतरों से निरापद बन गया था।
दीक्षा
भोग्य कर्मों का भोग पूरा हो जाने पर भगवान् ने अपने उत्तराधिकारी को राज्य सौंपकर वर्षीदान दिया शारीरिक वैभव के उत्कर्ष में मन में वेराग्य उत्पन्न होना लोगो के लिए आश्चर्य का विषय था।
निर्धारित तिथि-पौष कृष्णा त्रयोदशी के दिन एक हजार विरक्त व्यक्तियों के साथ आपने अणगार धर्म स्वीकार किया प्रभु के दीक्षा महोत्सव पर चौसठ इन्द्र एकत्रित हुए। भगवान् के उस दिन बेले की तपस्या थी। दूसरे दिन पद्मखंडनगर के राजा सोमदत्त के यहां परमान्न (खीर) से आपने प्रथम पारणा किया ।
तीन मास तक आप छद्मस्थ चर्या में विचरते रहे थे। नाना अभिग्रह तथा नाना विधि तप से आत्मा को निखारते हुए
फाल्गुन कृष्णा सप्तमी के दिन आप दीक्षा-स्थल सहस्राम्र बन में पधारे। उस दिन वहीं पर प्रियंगु वृक्ष के नीचे प्रभु को घातिक कर्म क्षम होने से केवलज्ञान प्राप्त हो गया।
केवल महोत्सव के बाद विशाल जनसभा में भगवान् ने प्रथम देशना दी। चतुर्विध संघ की स्थापना हुई।
प्रभु का परिवार
गणधर-तिरानवे (दिन्नमुनि आदि)
केवल ज्ञानी -दस हजार
मनःपर्यवज्ञानी-आठ हजार
अवधिज्ञान-आठ हजार
चतुर्दश पूर्वी-दो हजार
वैक्रिय लब्धिधारी-चौदह हजार
चर्चावादी-सात हजार छह सौ
साधु-दो लाख पचास हजार
साध्वी-तीन लाख अस्सी हजार (प्रवर्तीनीश्रीसुमना देवी)
श्रावक-दो लाख पचास हजार
श्राविका-चार लाख इक्यानवे हजार
निर्वाण
भगवान् चंद्रप्रभ ने लाखों लोगों का उद्धार किया। जीवन का अंत समीप समझ कर एक हजार सर्वज्ञ मुनियों के साथ सम्मेदशिखर पर चढ़े और अनशन किया। एक मास के अनशन में चार अघाती-कर्मों को क्षय कर आपने सिद्धत्व प्राप्त किया।
पांच कल्यानक तिथियां –
१. च्यवन- चैत्र कृष्णा ५
२. जन्म – पौष कृष्णा ११
३. दीक्षा-पौष कृष्णा १३
४. कैवल्य प्राप्ति – फाल्गुन कृष्णा ६
५. निर्वाण – भाद्रपद कृष्णा ६
६कैवल्य वृक्ष -Alexandrian Larel Tree
७ प्रतीक -crecesent Moon
