ई तन रो !
तर्ज : दिल करता….
रचयिता : मुनि मधुकर
ई तन रो, पल रो भरोसो नहीं, ई तन रो,
क्यूं इत्तो इतरावै, क्यूं दुष्कर्म कमावै, कद दिवलो बुझ ज्यावै ।।
दिन-रात एक धुन, भाग्यो-भाग्यो फिरै है,
ऊड़े है
आकाश नदी, सागरां नै तिरै है, हो….
पईसै रे खातर धरम गमावै ।। १ ।।
ई तन रो….
मीठो-मीठो बोले घणो, गाहकां रै सामनै,
ताकड़ी में तोले जणां, भूल जावै राम नै, हो….
कलम नै क्यूं तलवार बणावै ।। २ ।।
ई तन रो….
मोजां उड़ावै लोग, पाप कर् एकलो,
कोई ना बटावै हाथ, जाँच कर देखलो, हो ….
बाल्मिकी घटना साफ सुणावै ।। ३ ।।
ई तन रो….
एक सांस आयो भाई, दूसरे रो के पतो,
एक कोर खायो रहग्यो, दूसरे नै देखतो, हो ….
सपना अधुरा ही रह ज्यावै ।। ४ ।।
ई तन रो….
जाग-जाग पाली-पाणी, आया पेली बांध लै,
टूट रहया धागा काचा, सांधणा तो सांधलै, हो…. “मधुकर” साची बात बतावै ।। ५ ।।
ई तन रो….