Mahavir Ashtkam,( Aachary Mahapragya)

महावीर अष्टकम् (आचार्य महाप्रज)

१. अनेकान्तः कान्तः सकलसरितां संगम इव,
 प्रवादे स्याद्वादः सकलवचसामुद् गम इव । 
न सत्यं सत्यांशैर्वियुतमिह दृष्टं बुधजनैः, 
महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ॥
भगवान ने सत्य की उपलब्धि के लिए अभिलषणीय ‘अनेकांत’ का दर्शन दिया, जो समस्त विचारों की सरिताओं के संगमस्थल की तरह है। अनेकांत की अभिव्यक्ति के लिए स्याद्वाद की शैली प्रस्तुत की, जो समस्त वचनों के उद्गम की भांति है। उस ज्ञानी पुरुष ने देखा-जाना कि सत्य सत्यांशों से विकल नहीं होता। वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे।
न रागो  नो द्वेषः प्रशमरसपीयूषललितं 
शरीरं संवृत्तं गरलममृतं विस्मयकथा । 
न दृष्टिर्नो दंशः प्रखरफणिनश्चाऽपि सफलः, 
महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ॥
भगवान में न राग था और न द्वेष। शरीर प्रशमरसरूपी अमृत से ललित था। इसलिए गरल भी अमृत में परिणत हो गया, यह विस्मयजनक कथा है। तीव्र विषधर चंडकौशिक ने जहर उगलती हुई दृष्टि से भगवान को देखा और काटा, फिर भी वह सफल नहीं हुआ-शरीर को हानि नहीं पहुंचा सका। वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे।
महावीर अष्टक ०७.
३. इदं शस्त्रं भीतिं जनयति जनानामधिमनः,
 इदं सैन्यं दैन्यं जनयति समाजे प्रतिपदम् । 
विदेहे देहस्य स्थितिरभयमाप्नोति सहजं, 
महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ।।
(नन्दिवर्धन ने भगवान के सामने प्रस्ताव रखा आपकी सुरक्षा के लिए मैं अपनी शस्त्रधारी सेना को आपके साथ रखना चाहता हूं।) तब भगवान ने कहा- ये शस्त्र मनुष्यों के मन में भय उत्पन्न करते हैं। यह सेना समाज में पग-पग पर दीनता पैदा करती है। विदेह में देह की स्थिति सहज ही अभय को प्राप्त हो जाती जाती है। वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे।
४ . सुरक्षां नो नीता किमु तृणकुटीं भो मुनिवर !, 
निजं नीडं पक्षी तनुतनु रहो रक्षतितमाम् । 
तदा ध्यातं स्वात्मा प्रभवति कुटीरं न च परं,
 महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ॥
(अभिनिष्क्रमण के पश्चात् भगवान महावीर एक आश्रम में, कुलपति की आज्ञा से तृणकुटीर में रहे। निरंतर ध्यानावस्थित रहने के कारण उन्होंने कुटीर की ओर ध्यान नहीं दिया। कुटीर की घास गाएं चर गईं।) है।) तब कुलपति ने महावीर से कहा-मुनिप्रवर! आपने अपनी तृणकुटी की सुरक्षा क्यों नहीं की? आश्चर्य है कि छोटे से छोटा पक्षी भी अपने नीड की रक्षा करता है। तब भगवान ने सोचा अपनी आत्मा ही अपनी कुटीर हो सकता है, दूस्रा नहीं। वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे।
 ५. निमेषारद्धौ नून ज्ञपयति न चात्मा बहिरिह तथैवारद्धोन्मेषो ज्ञपयति च तत्त्वं बहिरपि । 
विचित्रा मुद्रेयं वरनयनयोर्ध्याननिरता,
 महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ॥
तुम्हारे अर्धनिमीलित चक्षु ज्ञापित कर रहे हैं कि आत्मा इस शरीर से बाहर नहीं है। उसी प्रकार प्रकट कर रहे हैं तुम्हारे अर्ध-उन्मीलित चक्षु कि तत्त्व बाहर भी हैं। ध्यान में लीन तुम्हारे प्रवर आँखों की यह मुद्रा विचित्र है। वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे।
६. अगम्यः स श्वासः परिमलमुपेतोब्जसुलभं, 
अगम्या सा वाणी प्रसरति सुदूरं सहजतः । 
अगम्यो गम्यस्त्वं कथमिति न जाने यतिपते!, 
महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ॥
अगम्य है वह श्वास, जो अब्जसुलभ परिमलयुक्त हो। अगम्य है वह वाणी, जो बिना किसी माध्यम के सहज सुदूर फैल जाती हो। हे यतिपते! तुम अगम्य हो। मैं नहीं जानता फिर तुम गम्य कैसे हो गए? वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे।
७. न कालस्यैकान्तो न खलु नियतेर्मुख्यपदवी, 
स्वकीयं कर्तृत्वं प्रबलपुरुषार्थेन फलितं । 
व्रतानां संदेशः श्रुतिमधिगतो मंत्रमभवत्, 
महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ॥
(कालवादी दार्शनिक एकान्ततः काल को और नियतिवादी दार्शनिक एकान्ततः नियति को ही प्रधान मानते थे।) तुम्हारे सिद्धान्त में न एकान्ततः काल को मुख्य स्थान प्राप्त है और न ही एकान्ततः नियति को। स्वयं का कर्तृत्व प्रबल पुरुषार्थ से फलता है। तुम्हारा व्रतों का संदेश कानों का विषय होकर मंत्र बन गया। वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे।
८. अनंतानंदेन क्वचिदपि न कष्टानुभवनं, 
अनंतं तज्ज्ञानं विदितमभितो विश्वमखिलम् ।
 अनंता सा शक्तिः क्वचिदपि न किंचित् प्रतिहता, महावीरो धीरः स्फुरतु मम चित्ते प्रतिपलम् ॥
अनन्त था वह आनन्द, जिससे कहीं भी तुम्हें कष्ट का अनुभव नहीं हुआ। अनन्त था वह ज्ञान, जिससे तुमने चारों दृष्टियों (द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव) से सकल विश्व को जाना। अनन्त थी वह शक्ति, जो कहीं किञ्चित् भी प्रतिहत नहीं हुई। वह धीर महावीर प्रतिपल मेरे चित्त में स्फुरित होता रहे।

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