(लय: आपणै भागां री)
रचयिता : आचार्यश्री महाप्रज्ञ
देवते ! बतलाओ
देवते ! बतलाओ शासन का आधार,
भिक्षुवर ! कैसे तुम बन पाए अवतार,
रोम रोम में रम रहे हो, बनकर एकाकार ।।
. १ अनुशासन ही बन रहा है, शासन का आधार । मर्यादा को सिर चढ़ाकर, बन जाता अवतार ।।
२. तेला भारीमाल का है, एक नया संसार चौमासी दीपां सती की, एक नया उपहार ।।
३. आज नहीं है हेम मुनिवर, प्रभु के व्याख्याकार जयाचार्य भी है नहीं, प्रभु भाष्यकार श्रृंगार ।।
४. आर्यप्रवर तुलसी मुनीश्वर, भक्त हृदय के हार । जिनकी मेधा ने दिया है, तुमको नव आकार ।।
५. मैंने समझा है तुम्हें यह, तुलसी का उपकार । मेरे गुरु का मानता हूँ, पल-पल मैं आभार ।।
६. इन्द्रियवादी चौपाई में, तव दर्शन साकार । नव पदार्थ की चौपाई में, खुला मुक्ति का द्वार ।।
७. अनुकंपा की चौपाई का, धर्म और व्यवहार । विश्लेषण बतला रहा है, दया धर्म का सार ।।
८. कालू करुणा से जुड़ा है, मुनि पृथ्वी का तार । श्रद्धाभूमि से जुड़ा है, भैंरू का परिवार । श्रद्धाभूमि से जुड़ा है, ईसर का परिवार । गंगा का गंगाशहर है, पावस पा गुलजार ।
४९. जन-जन में जागृत रहे नित, अणु-प्रेक्षा संस्कार ।। ‘महाप्रज्ञ’ गण में करो प्रभु, भक्ति-शक्ति