Tulsi Ashtkam (Aachary Tulsi)

तुलसी अष्टकम्
(आचार्य महाप्रज्ञ)
१. सदानंदस्पंदः प्रवहति मनोहारिवदने, 
प्रशस्तं वात्सल्यं स्फुरति सुखदं नेत्रयुगले । 
विकासे विन्यस्ता विमलविपुला दृष्टिरनिशं, 
जगद् वंद्म: स्वामी विशदचरितो नाम तुलसी ॥
 जिनके मनोहारी मुख पर सदा आनन्द का स्पन्दन प्रवाहित रहता था, जिनके दोनों नेत्रों में सुखद और प्रशस्त वात्सल्य स्फुरित होता था, जिनकी विमल और विशाल दृष्टि निरंतर विकास कार्यों में लगी रहती थी। ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वंद्य हैं।
२. अनन्तं माहात्म्यं वचनविषयं केन विहितं,
 स्वयं सिद्धा वाणी सहजमतिमानाप्तपुरुषः ।
 समृद्धो वाक्सिद्धेरतनुमहिमा सिद्धपुरुषः, 
जगद्वंद्यः स्वामी विशदचरितो नाम तुलसी ॥
उनका माहात्म्य अनन्त था। कौन उसे अपनी वाणी का विषय बना सका? उसका प्रतिपादन कर सका ? उनकी वाणी स्वयं सिद्ध थी। उनकी मति नैसर्गिक थी। वे आप्तपुरुष थे । उन्हें वचनसिद्धि प्राप्त थी। उससे वे समृद्ध थे। उनकी महिमा अपार थी। वे सिद्ध-पुरुष थे। ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वंद्य हैं।
३. कृता धर्मक्रान्तिर्निरसनमिता भ्रान्तिरखिला,
 प्रतिष्ठां  संप्राप्तं पुनरपि यतो मूल्यममलम् ।
 स धर्मः किं धर्मो यदि न मनूजो नीतिनिपुणः,
जगद्वंद्यः स्वामी विशदचारतो नाम तुलसी ।।॥
 उन्होंने धर्म की क्रांति की। धर्म के विषय में होने वाली सब भ्रांतियां टूट गई। नैतिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा हुई । उनका अभिमत था- वह धर्म क्या धर्म है जो मनुष्य को नीतिनिपुण नहीं बनाता । ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वंद्य हैं।
४. मनःपीठासीनः प्रथयसि मनःशान्तिमतुलां, वचःश्रेण्यारूढः सृजसि वचसो गौरवमलम् । मनोवाक्कायानां कथमिव सुयोगोऽजनि महान्,
 जगद्वंद्यः स्वामी विशदचरितो नाम तुलसी ॥
स्मृति के क्षण में प्रभो! तुम मन की पीठ पर आसीन होते हो तब अतुल मानसिक शांति का विस्तार करते हो। हो । स्तुति के क्षण में प्रभो! तुम वचनश्रेणी में आरूढ होते हो तब स्तुतिकार के वचन की गरिमा का सृजन करते हो। तुम्हारे व्यक्तित्व में मन, वचन और काया का यह सुयोग कैसे हुआ, आश्चर्य है। इसका तात्पर्य है- तुम्हारे मन में दूसरों को मानसिक शांति देने की, तुम्हारी वाणी में दूसरों की वाणी को आदेय बनाने की और तुम्हारी काया में में दूसरों को सौंदर्यानुभूति कराने की क्षमता है। यह योग कैसे हुआ ? ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वद्य हैं
५. अपूर्वा श्रीसम्पत् प्रतिपदमहोभावमुखरा, 
अपूर्वा ह्रीसम्पत् सहजमनुशास्तिं जनयति ।
 अपूर्वा धीसंपत् स्मृतिरपि विचित्राशयवती,
 जगद्वंद्यः स्वामी विशदचरितो नाम तुलसी ॥
अपूर्व थी तुम्हारी श्रीसंपदा (आभा की संपदा), जो देखने वालों को पग-पग पर अहोभाव से मुखर बना देती थी। अपूर्व थी तुम्हारी हीसंपदा (आत्मानुशासन की संपदा), जो सहज ही अनुशासन की भावना का सृजन करती थी। अपूर्व थी तुम्हारी धीसंपदा (बौद्धिक संपदा) और स्मृति भी, जो विचित्र-विलक्षण आशय वाली बनी हुई थी। ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वंद्य हैं।
६. अपूर्वा सा भक्तिर्जिनवरवचः ख्यातिमगमद्, 
अपूर्वा सा शक्तिः प्रबलपुरुषार्थे प्रकटिता । 
अपूर्वा सा शास्तिः प्रगतिमधिरूढा फलवती, 
जगद्वंद्यः स्वामी विशदचरितो नाम तुलसी ।।
अपूर्व थी तुम्हारी वह भक्ति जिससे जिनवर की वाणी प्रख्यात हुई, अपूर्व थी तुम्हारी वह शक्ति जो प्रबल पुरुषार्थ में प्रकट हुई। अपूर्व थी तुम्हारी वह शासनपद्धति जिसने प्रगति का आरोहण किया और वह फलवती बनी। ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वंद्य हैं।
७. विकासस्य श्वासः प्रतिपल मनायासमुदितः, प्रतीक्षासंलीना इव नवनवोन्मेषनिवहाः । 
समीक्षानैपुण्यं सुकृतिसुलभं दुर्लभतमं, 
जगद्वंद्यः स्वामी विशदचरितो नाम तुलसी ।।
तुमने विकास का जो श्वास लिया वह प्रतिपल अनायास ही गतिशील होता रहा। नए-नए उन्मेषों के समूह मानों आगे बढ़ने की प्रतीक्षा करने में लीन हो रहे थे। तुम्हारी समीक्षा की कुशलता भाग्यशाली के लिए ही सुलभ है। समीक्षा की ऐसी शक्ति का विकास होना दुर्लभतम है। ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वंद्य हैं।
८. श्रिये श्रीं श्रीं श्रीं श्रीं जपतु पतु तुलसीनामवलये, 
ह्रिये ह्रां ह्रीं ह्रीं ह्रः भवतु शिवनिष्ठा श्रुतवती ।
 धिये ऐं ऐं ऐं ऐं स्फुरतु सततं कण्ठकमले, 
जगद्वंद्यः स्वामी विशदचरितो नाम तुलसी ॥
श्रीसंपदा के लिए ‘तुलसी’ नाम का मानसिक वलय बनाकर श्रीं श्रीं श्रीं…. का जप चलता रहे। ह्रीसंपदा के लिए ह्रां ह्रीं ह्रौं हः का जप चलता रहे। उससे कल्याणनिष्ठा श्रुतवती बने । बौद्धिक सम्पन्नता के लिए कण्ठकमल में ऐं ऐं ऐं… का जप स्फुरित रहे। ऐसे विशद चरित्र वाले गुरुवर्य तुलसी स्वामी जगद्वंद्य हैं।
(अनुवादकः मुनि राजेन्द्र)

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