भावे-भावना-आचार्य तुलसी
भावे भावना, मन मोद न मावे रे ।।
मुगती रा मारग प्रभु च्यार बतावै रे
तिण में भावना अग्रेस कहावै रे ॥ भावे —
जो दान शील तप आदरणी नी आवे रे।
तो आ एकली शिवपुर पहुँचावे रे… जो दान शील तप अघ बंध रुपाने रे।
तिन में भावना रो सहारो चावे रे भावे —
आधर्म ध्यान रा भेदां में आवै रे
है अति निर्जरा एकाग्र बणावे रे ।। भावे
तन्मयता दृढ़ता समता सरसावै रे।
साधन शान्ति रो, भव भ्रान्ति हटावे
भावां भावा स्यू श्रेणी चढ़ ज्यावे रे
निज गुण में रमे वर केवल पावे रे ।। भावे
भावां री महिमा महितल महकावे रे ।
चढता भावा ही बाजी जीतावे रे ।। भावे
ऋषि प्रसनचन्द रो उपनय अजगावे रे।
अन्तर भाव रो ओ प्रगट दिखावे रे ।
संकल्प शक्ति निज जो सदा बढ़ावे रे ।
भाव विशुद्धता सहज्या समुज्यावे रे
आतम चिन्तन मेजो जोश जगावे रे।
भाव विशुद्धता सहज्या सझ ज्यावे रे भावे
संता री संगत में हृदय लगावे रे ।
भाव विशुद्धता सहज्या सझ ज्यावेरे ।। भावे
Π