करो तपस्या, मिटे समस्या, सुनलो रे,
भवजल तरणी, निर्मल करणी, करलो रे,
ऐसा अवसर, मिले न फिर, संभलो रे ॥ स्थायी ॥
तन धन यौवन चंचल माया, ज्यों बादल की छाया, दुनियांदारी झूठी यारी, क्यों मन को भरमाया।
मन समझाना, धर्म खजाना, भर लो रे।॥1॥
तप जप करते यौवन बीते, तो हम धन्य बनेंगे,
तन की मन की ममता छूटे, आवागमन मिटेंगे।
ज्ञान ध्यान कर, ये भव सागर, तरलो रे॥2॥
सुख दुख अपना अपना ही है, मूल बात को समझो
, और सभी जो निमित्त मात्र है, भ्रान्ति में ना उलझो। ‘संजय’ ज्योति, सदगुण मोती, चुनलो रे
(लय-दिल दीवाना)