(लय-आयो जैन जगत रो प्रमुख पर्व संवत्सरी रे)
लागे रोम रोम में तप रो तेज सुहावनणों रे,
म्हारे तपसी रो दीदार घणो मन भावणो रे।
लागे रोम रोम में
1. तपसी धीरे-धीरे चाले तन मन वाणी न संभाले,
दर्शन ज्ञान चरित्र रुखाले, घाले शुद्ध भावना रा रस,
आज घणो घणो रे।। लागे रोम रोम में —
2. मनडो आत्मा रमण में लागे,
तप न राखे निश दिन सागे,
होसी मंगल लारे आगे, जागे सो सोयोडो तपसी,
हृदय सरसावणों रे, लागे रोम रोम में
3. सगला कर्म कटक झङज्यावे,
आत्मानंद अमर पद पावें ।।
जय जय री झणकार लगावे, पावे सरस भजन स्यूं, हिवडो रंग रचावणों रे। लागे रोम रोम में
4. हर्ष विभोर हुवे मन म्हांरो, स्पर्श करया तप रे चरणां रो च्यारुं कुटां में उजियारो, घणों सुहावे भावे तप रो मंगल गांवणों रे। लागे रोम रोम में
5. गण वट वृक्ष मनोरम म्हारों,
लागे प्राणा स्यूं ओ प्यारो,
इणने जतनां स्यूं संभारो, इनरो रूप स्वरूप निहारो,
पासी ओर घणों विस्तारों, दीखो संगला में ओ न्यारो,
ध्रुव तारों ज्यूं सा तारां में है अगवावणों रे।। लागे रोम रोम में—-