(तर्ज : बंधे इक डोरी से)
कि भीखण बाबे ने, दीपां रे लाले ने कोटि रे कोटि प्रणाम….
सांवरिया तूं ही म्हारो राम ॥ टेर ॥ कि भीखण
1. कँटालिय में जनम्यो, बत्लूजी रे कुल में जाये
माँ दीपा रे आगणिये तू सिंह स्वप्न में आयो
छाई खुशियां हां अरे-२ हर गांव गांव घर घर ॥
१ ॥ कि भीखा सांसारिक सुखडां में बाबा, घणो नहीं लुभायो 2.
गुरु रघु स्यू दीक्षा लेवण ने, मनडो ललचायो
मरम धरम रो जाणग्यो – हाँ जाणग्यो रघुवर स्यू दीक्षाधार ॥२
भीखण
3. वीर प्रभु री वाणी ने, गुरुवर ने समझायें
नहीं गुरु रे आयो समझ में तेरापंथ बणाये
आगो थारो है अरे हा है अरे, थारे तो म्हे हां लार ॥३॥
भीखण
4. होतों घोर विरोध परन्तु बावो नहीं घबरायेो
खून पसीने स्यू सीचन कर, प्रभु रो पथ बणायो
मरुधर धोरी तू अरे हां तू अरे खोल्या से बंद द्वार ॥४॥
भीखण
5. मन मन्दिर में वसग्या गुरुवर, भक्त वण्या पुजारी
श्रद्धा री है ज्योत जलाकर बैठ्या चरणां थारी
जाप जपां थारो अरे हा थारो अरे नैया स कर दे पार ॥५॥
भीखण