Gahre Tal Me Moti Milasi

गहरे तल में मोती मिलसी

तर्ज – चांद सी महबूबा….
(रचयिता : साध्वी अणिमाश्री)
माटी रै ईं तन पर चेतन ! क्यूं इतो इतरावै है । 
दो दिन री ई चमक-दमक परे गाफिल ! तू भरमावै है ।।
धीरे-धीरे चाल रह्यो क्यूं, तेजी स्यूं अब कदम उठा । असली घर में जाणै खातिर, मोह-माया ने दूर हटा….२ अवसर बीत रह्यो लाखीणो, पाछो ओ नहीं आवै है ।।
आशावां रो दास बण्यो तूं, पल भर चैन नहीं मन में । रात-दिवस तूं दौड़ रह्यो, विश्राम नहीं है ई तन नै-२ । परमारथ री पगडण्डी ही, शिवपुर तक पहुंचावै है ।।
किता जन्म गंवाया केवल, मोह नींद में सोकर तूं । मोल नहीं समझ्यों ई तन रो, अपणी सुध-बुध खोकर तूं। अब तो जागो “अणिमा” थानै हेलों दे, र जगावै है ।।

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