(लय : चांदी जैसा रुप है तेरा)
झूमर नेमा नन्दलाल के गायें हम गुणगान एकादशामाचार्य चरणमें कोटि-कोटि प्रणाम
तुलसी तरासा है यह हीरा चमकदार
महाप्रज्ञ ने सौंपा गणको सक्षम संघ आघार
चारों तीर्थ निहाल हुए है पा अनुपम उपहार
हर चेहरे पर खिलि हुई है एक मधुरिम मुस्कान
एका दशमाचार्य
दिनकर सा देदिप्यमान चिरकांत चमकता चहरा
शशि सम शीतल शांत सौम्य सरासिज सा रूप सुनहरा ज्ञान गगन सा विशाल है और सागर सा तल गहरा अनुकंपा और अनुशासन है दोनो एक समान
एका दशमाचार्य