Mahapragya Pragya Ke Sagar

(लय : धर्म की लौ जलाएं…)
चरणो में शीश झुकाते हैं, 
महाप्रज्ञ प्रज्ञा के सागर, गौरव गाते हैं ।
मां बालू की रत्न कुक्षि को, तुमने धन्य बनाया, 
चौरड़िया परिवार का गौरव, तुमने खूब बढ़ाया। होलारामजी देख तनुज को, स्वप्न सजाते हैं ॥
• कालू-गुरु ने दी दीक्षा, तुलसी ने तुम्हें संवारा, 
अपनी कुशल शासना में रख, प्रतिपल तुम्हें निखारा। आज बने सिरमौर संघ के, शीश झुकाते हैं ॥
• जीवन तेरा उज्ज्वल निर्झर, नित्य सुधा बरसाता, 
अमृत पीकर तृप्त बना जो, द्वार तुम्हारे आता ।
 महके कलियां गण-वन की, कण-कण मुस्काते हैं ॥
• युग भाषा में बोल रहे, बन तुलसी के अनुगामी, 
विश्व शांति का मार्ग बताते, सच्चे अन्तर्यामी । 
करें कामना बनो चिरायु, तुम्हें बधाते हैं ।

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