(तर्ज -चन्दन सा बदन)
श्रद्धा के सुमन मेरे मन में लगन, शंखेश्वर प्रभु अन्तर्यामी.
मैं वन्दू बारम्बार तुम्हें, तुम तीन भुवन के हो स्वामी ॥
वो शुभ दिन पोष बदी दशमी, हुआ जन्म जगत में जिनेश्वर का, गूंजा ये गगन जय के स्वर में,आवन सुनके परमेश्वर का. है धन्य धन्य वामा माता. सौंपा जग को शिवसुखगामो ।।१।।
मिल जाये शरण तेरे चरणों में, मेरे मन को अभिलाषा है, तेरी भक्ति में लीन रहूँ, ये मन मुक्ति का प्यासा है।
ये “वीर मंडल” की अरज सुनो हे जगदीश्वर शिवसुखगामी ॥२॥