थांरी आंख्या में लोही रो ऊफाण
थांरी आंख्या में लोही रो ऊफाण। छोड़ो क्यूं कोनी क्रोध रो नशो ?
थांरी अक-बक बकणै री पड़गी बाण। दूजां नै काले नाग ज्यूं डसो ॥ ध्रुव ॥
क्रोध बड़ो दुर्गुण दुनिया में, घट-घट में वसनारो। जिण घट में नहि क्रोध निवासी, बो नर जगत-सितारो ॥
पंचेन्द्रिय प्राणी री यद्यपि, करै न कतल विचारो। तदपि कषायी नाम कुपित रो, आगम वचन निहारो ॥
प्रेम परस्पर दर पीढ्यां रो, शिष्टाचार सदा रो।
खिण भर में तिणखै ज्यूं तोड़ै, बोल वचन मुख खारो ॥
गाली सुण्यां न हुवै गूमड़ा, छिदै न अवयव थांरो। थे जो सहस्यो समभावां स्यूं, (तो) बो पिछतावणहारो ॥
गालीवान कठै स्यूं ल्यासी, मांग मधुर वच प्यारो। थे तो मृदुल मनोहरभाषी, अपणो विरुद विचारो ॥
. जठै क्रोध है, अहंकार री नियमा तजै न लारो।
सुण दृष्टान्त ‘सन्त धोबी रो’ मन री रीस उतारो।
विफल कियो ‘कुल-पुत्र’ रोष ज्यू झट बारह वर्षा रो। त्यूं प्रशांत उपशांत भाव स्यं ‘तुलसी’ सफल जमारो ॥