(लय- खड़ी नीम के नीचे मैं तो एक ली)
बीहड़ पंथ पर चलना नहीं आसान है
जलते अंगारो को कर में लेना काम महान हैं
नंगे पैरो वसुंधरा पर बहुत कठिन ही चलना है।
पंच महाव्रत स्वर्ण शिखर को निज कंधो पर धरना हें संयम लेना जीवन का बलिदान है
चंचल मनकी चंचलता को करना कठिन नियन्त्रण है
गुरुवरके चरणों में मन को करना होता अपर्ण हैं, इच्छित करने खातिर नहीं विधान है
भू पर सोना ,लूंचन करना भुजबल सागर तरना है
अपने पुरुषार्थों से अपनी निश्चित मंजिल वरना है आत्मिक बल ही सुख का सही निधान है
अजर अमर पद निधि को पाना लक्ष्य तुम्हारा सुन्दरहै रहना अटल सतत संयम में ज्यों ध्रुवतारा अविचल है
परिकर जन का सुखद श्रेष्ठ आह्रान है