धर्मवती नमाम्यहम्
कर्म व्रती नमाम्यहम्
गणाधिपति नमाम्यहम्
मोक्ष गति नमाम्यहम्
गुरुवर को निकट बिठाये मानस के मध्य सजाये-२
हम अमर संत और विश्व संत तुलसी को शीश झुकाए उन्हें श्रद्धा सुमन चढ़ाये ॥
मात वंदना तात झुमर मल के हाथों में पले ।
धार्मिक परिवार शुभ संस्कार सांचे में ढले ।
लाड करते थे सभीको लाडनू के लाडले
जाने किस अपराध पर रूठकर हमसे चले
रूठे गुरु देव मनाये तुलसी का गौरव गाये
हम अमर संत और विश्व संत तुलसी को शीश झुकाए
② युगपुरुष आते युगों में युग बदलनेके लिये
छोड़ते पदचिन्ह पदचिन्हों पेन्चलने के लिए
नाम को अनुव्रत मगर है हर महाव्रत से बड़ा साम्प्रदायिकता घृणा से दूर कोसो था खड़ा
हम अणुव्रत को अपनाएखुद समझे और समझाये
पहला चौमासा किया था गुरु ने बीकानेर मे पास ही गंगाशहर पर पहुंचे कितनी देर में
मांगलिक सबको सुना गुरुवर विदाई लेगये
बाल मुनियों को वे अपनी श्वास अंतिम देगये
हम बारम्बार बुलावे जाने वाले नहीं आये
अमर संत और विश्व संत तुलसी को शीश झुकाए
तेरापंथ भवन से गुरु की भव्य शवयात्रा चली
दर्शनों के हेतु जनता हो रही थी बावली
मौन् बैकुंठी में सोये धर्म वानों के पिता
सबने देखा एक सूरज को जलाती है चिता
अनुयायी नीर बहाये महाप्रज्ञ जी धीर बंधाये
हम अमर संत और विश्व संत तुलसी को शीश झुकाए
एक, गुरु है वर्तमान और दूसरा इतिहास है
है यह ऐसा पुष्प तुलसी का जहाँ आभास है
हमको अब महाप्रज्ञ के नेतृत्व पर विश्वास है
यू लगे गुरुदेव की प्रतिमूर्ति जैसे पास है।
इनको ही व्यथा सुनाए इनसे ही सांत्वना पाये
हम अमर संत और विश्व संत तुलसी को शीश झुकाए