गणगौर की कहानी
राजा क बाया जौ चणा, माली क बाई दूब ।
राजा का जौ चणा बढ़ता गया और माली की दूब घटती गई।
एक दिन माली गाडा क लार छीप कर देखण क लिय बैठ गयो कि म्हारी दूब घट किया।
दूसरे दिन सुबह छोऱ्यां मिलकर दूब तोडणन आइ तो माली कोई छोरी की चुनड़ी छीण ली, कोई का घाघरा, तो छोऱ्या बोली थे म्हारी चूनड़ी घाघरा दे देवो म्हें थान गोर का सोलह दिन हूया पछ मिठाई और डाकला ल्याकर देवांगा
तो माली वां छोर्या न छोड दियो। गोर का सोलह दिन हुया अच्छा छो माली के अठ ढोकला और मिठाई देकर आई तो मालण कोटड़ी म सब किया कि आज तो घणी मिठाई पड़ी है कोटड़ी में स जाकर ले ल
तो छोरो कोटडी सामान धर दी। थोड़ी देर बाद में माली को छोरो आयो कि मां भुख लागी है तो मालण चाल्यो तो कोटड़ी खली कोनी । जणा मालण चीटली आंगली स्यू कुक को छांटो दियो गोबाटडी में गोर ईशरजी बैठया है।
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