ज्ञान-चूनड़ी
ओडो-२ ओ तपसणजी, शील सुरंगी चुनड़ी, चोखी लागै ओ तपसणजी, तपस्या रंग री चूनड़ी ।।
१
. मलमल जयपुर की मंगवाय क्यो, ज्ञान गुलाबी रंग रंगवाय क्यों, बेल दया की छपवाय दयो
, बूंटी क्षमा की लगवाय दयो,
झालर तपस्या री लगवाय दयो,
गोटो जयपुर को लगवाय दयो।। ओढो-२
२. सुरमो शरमाई रो सारो,
बिंदिया पति प्रेम की धारो, झूठ वचन कभी मत बोलो, लाली बाई नै बस राखो,
नथली पति नाम की पहरो, चम-चम चमकै औ तपसणजी ज्ञान सुरंगी चूनड़ी ।। ओढो-२
३. चूड़ी चतुराई री पहरो,
कंगन कठिनाई रा धारो, कब्जो,
मन कब्जो कर राखो, लहंगो नरमाई रो पहरो,
चूनड़ी पीहर री जी ओढो, जगत सरावै औ तपसणजी शील सुरंगी चूनड़ी आछी लागे ओ तपस्या में ज्ञान गुलाबी चूनड़ी। ओढो-२
४. ओढ-२ सतियां रे पधारो,
थारै तपस्या रो रंग खिल्यो,
जगत सरावै औ तपसणजी शील सुरंगी चूनड़ी ।।
चोखी लागै ओ तपसणजी, तपस्या रंग री चूनड़ी ।।
५. घर का काम शीघ्र कर लेना,
सास ससुर की सेवा भी करना,
चलना पति प्रेम के लारै क, चोखी लागै चूनड़ी।
ओढो-२ ओ तपसणजी, शील सुरंगी चूनड़ी ।।
4