तुलसी अर्चना (तर्ज – ऐ मेरे वतन के लोगों….)
भैक्षव शासन नवमाधिप, तुलसी प्राणों से प्यारे ।
चरणों में तेरे वंदन, चंदेरी लाल दुलारे ।।
मां वंदना के आंगन में, तुम नई रोशनी लाए ।
कुमकुम पगल्या प्रांगण में, पा दिव्य रूप हरसाए ।
द्वितीया के इस चंदा को, ये प्यासे नयन निहारे ।।1।।
गुरु कालू चरण शरण में, जीवन सारा न्योछावर । पाकर गुरु का शुभ साया, तुम बन गए सुपरपावर तेरापंथ शासन गणपति, जन-जन के तारणहारे ।।2।। महातेजस्वी मुखमुद्रा, नयनों की छटा निराली । गर्जित घनरव सी लगती, वाणी अमृत की प्याली । आ तेरी पुण्य शरण में, जीवन में नई बहारें ।।3।। आषाढ़ी कृष्णा तृतीया, है पुण्य तिथि प्रभुवर की।
यादें है खूब लुभाती, उस पारिजात परिमल की।
उपकार किया था जग का, गुण गौरव गाते सारे ।।4।।
तेरापंथ शिखर चढ़ा है, नव ऊर्जा तुमसे पाकर ।
है महाश्रमण बरतारा, प्रभु छटा निहारो आकर ।
हर भक्त तुम्हें बुलाता, ओ गणवन के रखवारे ।।5।।