कठै स्यूं आयो भिक्षु
कठै स्यूं आयो भिक्षु, कठस्यूं आयो कालू । कठै स्यूं आयो हो, सन्तां तुलसी प्रभु ।।
कांठा स्यूं आयो भिक्षु, छापर स्यूं आयो कालू । चन्देरी स्यूं आयो हो, भक्तां तुलसी प्रभु ।।१।।
किणरै जायो भिक्षु, और किणरै जायो कालू । ओ किणरै जायो हो, सन्तां तुलसी प्रभु ।।२।।
दीपां रै आयो भिक्षु, छोगां रै जायो कालू । मां वदना जी रै जायो, भक्तां तुलसी प्रभु ।।३।।
कांई खोज्यो भिक्षु, और कांई खोज्यो कालू । और कांई खोज्यो हो, सन्तां तुलसी प्रभु ।।४।।
सत्य खोज्यो भिक्षु, और क्रान्ति खोजी कालू । और अणुव्रत खोज्यो हो, भक्तां तुलसी प्रभु ।।५।।
कांई दियो भिक्षु, और कांई दियो कालू । और कांई दियो हो, सन्तां तुलसी प्रभु ।।६।।
तेरापंथ दियो भिक्षु, और ज्ञानि दियो कालू । और जीवन विज्ञान दियो, भक्तां तुलसी प्रभु ।।७।।
कठे विराजै भिक्षु, और कठै विराजे कालू । और कठै विराजै ओ, सन्तां तुलसी प्रभु ।।८।
सिरियारी विराजै भिक्षु, गंगापुर विराजे कालू । गंगाणै विराजै ओ, भक्तां तुलसी प्रभु ।।१।।
(तर्जः कठै स्यूं आई सुंठ…)
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