धम्म-जागरणा
तेरापंथ-प्रबोध
श्रद्धा स्वीकारी तेरापंथ रा अधिदेवता !
शक्ति संचारों तेरापंथ शासन-देवता ।
थारै पर म्हांरी आस्था अपरम्पार हो,
जन जीवन आधार हो, ह्रत्-तन्त्री रा तार हो,
मरुधर रा मन्दार हो, तेरापंथ रा अधिदेवता ।
१. राजस्थान गाम कंटालिय आषाड़ी तेरस आई,
बल्लू शा दीपां घर जायो, पुत्र फळी है पुण्याई ।
हो सन्तां। सतरैसै तंयासी संवत श्रीकार हो ।
२. शुभ मुहरत में नामकरण संस्कार सझायो बालक रो, भिक्खण भिक्खू भाव भरयो, भावी शासन संचालक रो । हो सन्तां। मंगल गीतां री घर-घर में गुंजार हो ।।
३. ‘होनहार विरुवान चौकणा-पात’ बात विख्यात है, ‘उगंतो हो तपै तेज, रवि उदाहरण नवजात है ।
हो सन्ता। प्रतिभा उत्पत्तिया पाई आकार हो ।।
४. सौखी महाजनी विद्या अब महाजनां नै मात करें, किण री हिम्मत भिक्खण आगे इसी बिसी कोइ बात करें । हो सन्तां। बचपन में ही बालूड़ो तेज-तरार हो ।।
५. नान्ही वय में ही भिक्खण-शादी री बाजी शहनाई, बगड़ी में ससुराल सहचरी सौभागण सुगणीबाई ।
हो सन्तों। जाई इक सुता, सहज सिमट्यो परिवार हो ।।
६. सन्त-सत्यां री साजे सेवा, करे धर्म री साधना, तात्त्विक बोल थोकड़ा सीखै, आध्यात्मिक आराधना ।
हो सन्तां। जागी जागरणा जाण्यो जग निस्सार हो ।।
७. सही सजोड़ै दीक्षा लेणी, मनोमनां संकल्प करयो,
तब लग शील सजोड़े पाळां,ओ पिण व्रतअविकल्प धरयो ।
हो सन्तां । प्रारम्भ्यो एकान्तर तप दुक्करकार हो ।।
८. नियति-योग पत्नी वियोग, नश्वरता तन री पहचाणी, ‘समयं गोयम! मा पमायएं’ मुखर हुई आगम-वाणी ।
हो सन्तां! अब तो क्षण-क्षण भी बीतै भारी भार हो ।।
९. दीक्षा री अनुमति मांगी, मां सिंह-सपन री बात कही, समझावण आया रघु राजा, उग्यो है परभात सही ।
हो सन्तां ! मोकै रो मंतर मां पर करग्यो कार हो ।।
१०. दीपां बाई! थारो बेटो, देख शेर ज्यूं गूंजैला,
धूजैला थर-थर कायर, ओ कर्म-कटक स्यूं जूझेला ।
हो सन्तां! होग्यो भीखण रो अब तो बेड़ो पार हो ।।
११. रामचरणजी भीखणजी रै मैत्री रो सम्बन्ध हो,
एक साथ वैराग साधणै रो कल्पित अनुबंध हो । हो सन्ता! अब भी सौहार्द, सनेही संव्यवहार हो ।
हो सन्ता। दोन्यू निर्गुण-पूजा रा पक्षधार हो ।।
१२भीखण मुनि बण रघु-चरणां मेंशास्त्रां रो स्वाध्यायकरै, कथनी-करणी रो अन्तर लख मानस में संशय उभरै ।
हो सन्ता! उमड्यो, दुर्वार जिज्ञासा रो ज्वार हो ।।
१३. रघुवर सोचे-पापभीरु वैरागी जिण स्यूं जिज्ञासा,
बड़ो विनीत भक्त है, इण स्यूं है मोटी-मोटी आशा ।
हो सन्तां। भीखण खींचे गहरो शास्त्रां रो सार हो ।।
१४. राजनगर मेवाड़-जातरा रो आयो अवसर ठावो, शंकाशील बण्या है श्रावक, भीखणजी! जा समझावो । हो सन्तां। अणचिंत्यो बणग्यो जागृति रो आसार हो ।।
१५. जा, धीरप स्यूं चतुराई स्यूं सब नै लिया प्रभाव में, शंका मूल मिटी नहिं तो भी बहग्या भावुक भाव में ।
हो सन्तां! पायो जस, बहुड़ायो वनणा-व्यवहार हो ।।
१६. कुण जाणै के हुयो, अचानक राते तेज बुखार चढ्यो, सीयो-दाहो लग्यो भयानक बेचैनी रो वार बढ्यो ।
हो सन्तां । खुलग्यो अन्तःस्फुरणा रो अभिनव द्वार हो ।।
१७. उतरै आज बुखार, परिस्थिति पर मैं पुनर्विचार करूं, हो निष्पक्ष जिनाज्ञा सम्मत साचो पथ स्वीकार करूं ।
हो सन्तों! ढ़ळग्यो ज्वर फळग्यो असमय में सहकार हो ।।
१८.हर्षविभोर भोर स्यूं ही भिक्खण चिन्तन मेंजोरजुट्यो, धर्म धार्मिकां री दुरवस्था देख कळेजो कांप उठ्यो ।
हो सन्तां ! सतपथ-स्वीकृति रो घोषित कियो करार हो ।।
१९. श्रावक बाग-बाग पर रघुराजा रो मूड विचित्र बण्यो, भिक्खण सविनय शान्त कियो गुरु मानस तीव्र तणाव तण्यो ।
हो गुरुवर ! चिन्तन मांगै अपणो आचार-विचार हो ।।
२०. भिक्खण! बात सही है पिण पंचम आरै री कठिनाई, ‘पंच-वचन शिरमाथै, पर परनाळ की सी’ स्थिति आई।
हो सन्ता ! करणी के? आपस में न बढ़े तकरार हो ।।
२१. एक ओर आगम है, एक ओर गुरु रो अपनत्व है,
पर सिद्धांतां, सच्चाई ये सब स्यूं बड़ो महत्त्व है।
हो सन्तां । एकै बिन हो ज्यावै बिन्द्यां बेकार हो ।।
२२. सोच्यो, सही-सही बातां क्यूं नहीं गुरु स्वीकारसी, ‘कर कंगण आंख्यां स्यूं दीखै, फिर के करसी आरसी ?’ हो सन्तां । विस्तृत वार्ता भी असफल आखिरकार हो ।।
२३. अभिनिष्क्रमण करयो स्थानक स्यूं सुण अवाक रहग्या सारा, भीखणजी-सा सन्त विरागी हुया संघ स्यूं क्यूं न्यारा ?
हो सन्तों! चर्चा चौतरफी बगड़ी रै बाजार हो ।।
२४. आण-दुहाई फिरी संघ री, स्थान नहीं देणो आंनै, देणैवाळे पर जुर्मानो सुणल्यो सै चोड़ै छानै ।
हो सन्तां ! बैठा, सब श्रावक मन में करड़ी धार हो ।।
२५. करां व्यार छोड़ां बगड़ी नै, निर्णय ले चाल्या पुर स्यूं, करतां ही प्रस्थान, उठ्यो तूफान परीषह ओ धुर स्यूं ।
हो सन्तां! ‘एकानी नदी और एकानी न्हार हो’ ।।
२६. आज रात शमशान-वास, कर मतो पधात्या, छतरी में, साहस शिखर चढ्यो बाबै रो, जाग्यो पोरस खतरी में । हो सन्तों! पोरस रै आगै मानै सगळा हार हो ।।
२७. पूरी रात बिताई चिन्तन में, अब आगे के करणो ? क्यूं हरणो कष्टां स्यूं, है ‘चत्तारी मंगल’ रो शरणो ।
हो सन्तां ! अपणी आत्मा ही अपणी पहरेदार हो ।।
२८. रघुवर आय बकारै भीखणजी! थे करो न नादानी, आगो धांरो पीछो म्हांरो, नहीं चलैला मनमानी ।
हो भिक्खण! पग-पग पर लोग लगास्यूं थारै लार हो ।
२९. आशीर्वाद रूप में ली गुरुवाणी जो अभिशापमयी, दीपां मां नै याद करी, दिलगीरी देख विलापमयी ।
हो सन्तों ! वीरोचित वीरवृत्ति रो ओ व्यापार हो ।।
३०. बगड़ी स्यूं बड़लू में गुरु-चेलां विच चर्चा खूब छिड़ी, जोधाणै में गेरुलालजी व्यास जिस्यां री कड़ी जुड़ी ।
हो सन्ता! भावी भीलाड़े आयो एक उभार हो ।।
३१. किशनोजी सुत रो कर पकड्यां कठिन समस्या करी खड़ी, रू-रूं में सांवरियो बसियो अलग रहूं नहिं एक घड़ी ? हो सन्ता ! सूंप्या जयमल नै तीनूं घरां बहार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (रूं-रूं में सांवरियो ) ।।
३२. जोधाणै री हाटों में श्रावक सामायिक ले बैठा, स्थानक छोड़ अठै सामायिक, कांई बात हुई के ठा ?
हो सन्तां ! पूछै ‘दीवान’ बताओ बेरैवार हो ।।
३३. करां हाट बैठ्या सामायिक, म्हें से स्थानक नै छोड्यो, धर्म-क्रांति आ गुरु भिक्खण री, नई दिशा में मुंह मोड्यो । हो सन्तां। ओ है मंतव्य, ओ असली आचार हो ।।
३४. तेरा श्रावक, भीखणी रै साथी तेरा सन्त है,
तेरा ही है नियम, सभी मिल सुन्दर तेरापंथ है।
हो सन्ता! तुक्को सेवग रो पायी शीघ्र प्रसार हो ।।
३५. सुण चौक्या स्वामीजी, फिर मंथनपूर्वक मंजूर कियो, हे प्रभो! यह तेरा पंथ पथिक म्हे संशय दूर कियो ।
हो सन्ता। वंदन-मुद्रा में बोल्या बारम्बार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (प्रभो। यह तेरापंथ महान ) ।।
३६. मरुधर स्यूं मेवाड़ केलवा री धरती पर पांव घरया, मिल्यो नहीं आवास वास हित, मन समता रा भाव भरया । हो सन्तां । अन्धेरी ओरी रो होणो निस्तार हो ।।
३७. जिनमंदिर में यक्ष देव-कृत कड़ी कसौटी पार हुई, सही सलामत देख सवारे ‘सबकी आंख्यां चार हुई । हो सन्तों। सारै पुर होग्यो तेरापथ स्वीकार हो ।।
३८. आषाढ़ी पूनम री सन्ध्या बणी अबन्ध्या इतिहासी, ली सोत्साह सभी नव दीक्षा सुमरत अर्हत अविनासी ।
हो सन्तां ! कुण-सी बा बेळा-पुळ आई अविकार हो ।।
३९. तेरापंथ स्थापना दिन री आज स्वयं शुरुआत हुई, अरे पांचमे आरे चौथे आरे की सी बात हुई । हो सन्तां! घणो सुहावै दीपां मात दुलार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (घणां सुहावे माता ) ||
४०. लाभालाभे सुहे दुहे जीणै मरण में सम रहणो,
निन्दा और प्रशंसा समता स्यूं अपमान मान सहणो ।
हो सन्तां।धारयो संजम रो पथ तलवार दुधार हो ।।२४४ धम्म-जागरणा
४१. स्वागत है अभ्यागत। खुल्लो परीषहां नै आमंत्रण, मेरु-सी ऊंचाई सागर-गहराई सो साध्यो प्रण । हो सन्तां । गावो संगीत स्वर लहरी संचार हो ।।
४२. पांच बरस तक मिली नहीं जीवन-यापन री सुविधावां, पाली घी, घी सहित घाट ली, अगणित है जै घटनावां । हो सन्तों! पावस बिच में ही करणो पड्यो विहार हो ।।
४३. पग-पग पर अवरोध, विरोधी वातावरण रह्यो बढ़तो, जनता-प्रतिबोधण रो सपनो कठै कियां शिखरां चढ़ती । हो सन्तां । लीन्हो आतापना-संबल साभार हो ।।
४४. धम्मगिरी, तरणी तपस्विनी रो वो सीन निहारां म्हे, ‘मर पूरा देस्यां तप जप स्यूं आतम कारज सारां म्हे । हो सन्तां! आई है क्षणिक निराशा एक बार हो ।।
४५. सूझबूझ थिरपाल फतै री, लिखीजसी स्वर्णाक्षर में, सम्बोधनपूर्वक उद्बोधन दियो सुरंगो सुस्वर में। हो सन्तां। बादळियो आंखड़ल्यां बरस्यो इकधार हो ।। गावो गीत सुष्यार हो (बादळियो आंखड़ल्यां में पृष्ट-५८) ।।
४६. हो आदेश तपस्या रो, म्हानै म्हारो अधिकार मिलै, जन-उद्बोधन काम आपरो, जनता रो उपहार मिलै । हो सन्तां। मानी सन्तर्ता री अन्तरमन मनुहार हो ।।
४७. प्रारम्भ्यो अभियान दुबारां, लोग निकट आवण लाग्या, आकर्षण बढ़ग्यो दरसण में, पद फरसण स्यूं भ्रम भाग्या । हो सन्तों! फळग्यो आशीर्बर ‘लोग लगास्यूं लार’ हो ।।
४८. तीरथ तीन देख जन बोल्या, लाडू है खांडो थांरो, खांडो भले चोगुणी रो है, थिरता राखो सुसतारो ।
हो सन्तां। सतियां री दीक्षा रो उद्भुत इकरार हो ।।
४९. अट्ठारै सतरै स्यूं बत्तीसै लग विषम बगत बीत्यो,
थोड़े परिकर में भी स्वामी जबर जंग-सो है जीत्यो ।
हो सन्तां । दिन रो खाणो निशि सोणो भी दुश्वार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (बंदना लो झेलो ) ।।
५०. तेरा मां स्यूं सात गया, छव रह्या परम परमार्थपखी, थिर थिरपाल फते. भी. भारी. हर. टोकर. अभिधान अखी । हो सन्तों! आगै स्यूं आगै अब बढ़सी विस्तार हो ।।
५१. बत्तीसै मिगसर बिद सातम संविधान रो लिखत लिख्यो,
भारिमाल रै खंघां पर भावी शासन रो भार टिक्यो ।
हो सन्तां ! छोटै सै कागज में कलमां कलदार हो । हो सन्तां! ‘भारी मर्यादा बांधी’, गीत सुप्यार हो ।।
५२. संविधान, सुविधान बणाकर सब सन्तां नै अवगति दी, अलग-अलग दिखला सारां री हार्दिक भावे सहमति ली । हो सन्तां! नूतन अध्यात्म-तंत्र रो आविष्कार हो ।।
५३. भारिमालजी तो भोळा, इण पदवी जोग तिलोक है, सही नहीं निर्वाचन, बोल्या चंद्रभाण बेरोक है। हो सन्तां ! बणग्या खुद सूरीपद उम्मीदवार हो ।।
५४. सुणी बात स्वामीजी, सहज्यां शब्द वदन स्यूं नीकळ्यो,
सूरी नहिं तो सूरदास पद शायद, बो भी है फल्यो ।
हो सन्तां । नैसर्गिक वचन-सिद्धि रो साक्षात्कार हो ।।
५५. अनुशासन आधार संघ रो, अनुशासन ही प्राण है, अनुशासन है पंथ प्रगति ये, अनुशासन ही त्राण है। हो सन्तां । ‘ज्योतिर्मय चिन्मय दीप’ हरै अन्धार हो ।।
गावो गौत सुप्यार हो (जय ज्योतिर्मय चिन्मय दीप) ।।
५६. हेम-हजारी सिरियारी रो बण्यी विमल दिल बैरागी, समै-समै शुभ सेवा साझै भिक्खण चरणां लौ लागी ।
हो सन्तां । ताका-ताकी में क्यूं बैठो अविचार हो ।।
५७. ‘अरे हेमड़ा। दीक्षा लेसी के तूं म्हारै मर-या पीछे
या जीते जी’, बोल्या भिक्षु कह दै थारै जिसी जचै ।
हो सन्तां । ललचावै यूं म्हांनै क्यूं ऊठसवार हो ।।
५८. दोरी लागी, लज्या जागी, त्याग किया अब शादी रा, जियड़ो जमग्यो साधपणां में जगमगग्या दिवला घीरा।
हो सन्तां । अट्ठारै तेपन में दीक्षा संस्कार हो ।।
५९. संख्या घटी न सन्तां री, है हुयो हेम रो पगफेरो, स्वामीजी स्यूं गून्थ्योड़ो जीवनपोथी रो हर पेरो ।
हो सन्तों। विद्यागुरु जयाचार्य मान्या निरधार हो ।।
६०. गुणसट्टै मा. सुद सातम अंतिम मर्यादापत्र है, मर्यादोत्सव रो निमित्त मर्यादामय गणछत्र है।
हो सन्तां। भिक्षु-शासण रो सारो दारमदार हो ।।
६१. एक हुवै आचार्य संघ में सही एक सामाचारी, परूपणा रो पंथ एक-सो नहीं कहीं थारी म्हारी ।
हो सन्तां! शैली अलबेली छूट्यो स्वेच्छाचार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (म्हांनै घणा सुहावै जी ) ।।
६२. सार्वभौम सिद्धान्त घोषणा करी अभय हो स्वामीजी, जिनवाणी पर पूर्ण समर्पित आस्थामय हो स्वामीजी ।
हो सन्तां। देता ही रह्या धर्म नै नयो निखार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (जाग्रत धर्म हमारा) ।।
६३. पोषण जठै असंजम रो बो दान दान है, धर्म नहीं, मारै एकण नै पुचकारै, रोष राग है धर्म नहीं ।
हो सन्तां। शिवपथ में साधन री शुद्धी अनिवार हो ।।
६४. अर्हत-आज्ञा धर्म, अनाज्ञा अधरम खरी कसौटी है, धन स्यूं धर्म खरीदीजै, आ श्रद्धा जड़ स्यूं खोटी है।
हो सन्तों। बलजबरी चलै न धार्मिक कारोबार हो ।।
६५. पुण्य-बंध धार्मिक करणी स्यूं, केवल पुण्य स्वतंत्र नहीं, नाज बिना तूड़ी पैदा करणै को कोई तंत्र नहीं ।
हो सन्तां! लौकिक लोकोत्तर दोनूं पृथक प्रकार हो ।।
६६. धूप-दीप फळ-फूल आदि स्यूं प्रतिमा पूजा धर्म नहीं, आलम्बण बणणै स्यूं पूजनीय हो, जिनमत मर्म नहीं ।
हो सन्तां! निक्षेपो स्थापना निर्गुण आकार हो ।।
६७. श्वेताम्बर आगम आस्था पर म्हें चारित्र निभावां हां, और धर्म उपकरण रूप में वस्त्र पात्र अपणावां हां ।
हो सन्तां! मूर्च्छा नहिं मान्य, पडुत्तर धारफार हो ।।
६८. आगम परम्परा स्यूं प्राप्त सत्य पर दिल दृढ़ताई हो, अपणै सिद्धान्तों में नहीं शिथिलता राई-पाई हो।
हो सन्तां ! मन की मजबूती कर दै खेवो पार हो ।।२४८ धम्म-गरणा
६९. चालू शब्द समन्वय क्यूं हो किण पर ही आक्षेप कहीं, बेमतलब पर मन्तव्यों में करणों हस्तक्षेप नहीं । हो सन्तों! समुचित सापेक्षवाद रो ओ उपहार हो ।।
७०. नवपदार्थ अनुकम्पा, श्रद्धाऽऽचार, प्रताव्रत चौपाई, बारहव्रत, निक्षेप, विनीत, विपुल साहित्य पढ़ो भाई । हो सन्तां। भिक्खू-दृष्टान्त तो हिमई से हार हो ।।
७१. लिखी शील री बाड़, रास टाळोकर एकल री दाळां, आगम रा आख्यान, बोकड़ा सावधान हो संभाळां । हो सन्तों! अपण जुग रा सर्वोत्तम सिरजणहार हो ।।
७२. चर्चावादी, कुशल-प्रशासक, मौमांसक, संगायक हा, पुरुष-परीक्षक और समीक्षक नव्य नीति-निर्णायक हा । हो सन्तों। प्रगट्यो कोई एक नयो उद्योतकार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (प्रगट्यो एक नयो उद्योत पृष्ट ७०) ।।
७३. जीवन भर यायावर स्वामी साठे आया सिरियारी, कच्ची पक्की हाटां में पावस री पूरी रिझवारी । हो सन्तां! प्रतिदिन व्याख्यान गोचरी श्रम सहचार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (निहारा तुमको कितनी पृष्ट ६२) ।।
७४. सिरियारी में प्राय आठ सौ ओळी तेरापंथ्यां री, ठाकुर दौलतसिंह हृदय में हरी-भरी श्रद्धा-क्यारी । हो सन्तां । सम्मुख है पर्वतमाळा रो प्राकार हो ।।
७५. सावण सुद पख में स्वामीजी री काया कमजोर पड़ी, अन्न अरुचि है और अपच है तो भी मे’नत करें कड़ी । हो सन्तां । तरतर तन छीजै आमय अप्रतिकार हो ।।
७६. भाद्रव शुक्ल चौथ दिन शिष्यां नै स्वामीजी बतलावै, भारिमाल, टोकरजी और खेतसीजी नै विरुदावै । हो सन्तों। पाल्यो संजम जो निर्मल निरअतिचार हो ।।
७७. लागै अब आयुष्य निकट है, पर न मौत से भय म्हारै, रही न कोई ऊणायत देखो चाहे भीतर बारै ।
हो सन्तां! अणसणमय जीवन से अब उपसंहार हो ।।
७८. रायचन्द । तू बुद्धिमान बालक है, पोटी छोटी है,
मोह नहीं कीजै म्हारै स्यूं, आ ही बड़ी कसौटी है।
हो गुरुवर। मैं क्यूं मोहाकुल आप करो उद्धार हो ।।
७९. संत खेतसी बोलै स्वामी। आप पधारो स्वगों में, स्वर्ग! मनै नहिं स्वर्ग चाहिनै, मत उलझो थे भी आंमें ।
हो सन्तां । पुद्गल सुख भुगत्या जीव अनन्ती बार हो ।।
८०. पांचम छमच्छरी दिन स्वामी चौविहार उपवास करयो,
छट्ठ पारणो करयो अल्प-सो, बो भी बिलकुल नहीं जरयो । हो सन्तां! काची काया रा औ ही नेगचार हो ।।
८१. सातम-आठम नवमी दशमी अल्प आ’र आश्वास लियो,
एकादशमी अमित आत्मबल स्यूं स्वामी उपवास कियो । ही सन्तां। बारस बेलै रै दिन अन्तर-उद्गार हो ।।
८२. भारमल्ल नै म्हां ज्यूं मानीज्यो थे अन्तर-भाव स्यूं, पापभीरु उत्तम प्राणी है, पटघर आत्म-प्रभाव स्यूं । हो सन्तां। रहिज्यो आराधता इंगित-आकार हो ।।
८३. हेत परस्पर राखीज्यो, मत ओगुण किण रा ढूंढ़ज्यो, दीक्षा देख-देख नै दीज्यो जिण-तिण नै मत मूंडज्यो । हो सन्तों। ममता चेलां री ले डूबे मझधार हो ।।
८४. टोळा रा टाळोकरों रो टाळणो सम्पर्क है
, अपचंदा रो, अविनीतां रो होवै बेड़ो गर्क है।
हो सन्तां! आज्ञा मर्यादा अपणी यादगार हो ।
८५. पक्की हाट पधारधा स्वामी पगा चाल दिन दोफारा, ‘पुद्गल खीण पड़े है भंते! तो ल्यो अणसण स्वीकारा’ ।
हो सन्तां। पचख्यो संथारो ऊंचे स्वर तिविहार हो ।।
८६. लोक हजारां भक्ति-भाव स्यूं दर्शण खातिर आवै है, सार्थक और सफल यात्रा, गुण मुक्त कंठ स्यूं गावै है ।
हो सन्ता। अपनी तकदीर सरावै सौ-सौ बार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (हमारे भाग्य बढ़े बलवान ) ।।
८७. बीती बारस रात प्रात तेरस रो अब ओ उदियारो, चढ्या प्रहर दिन जळ आरोग्यो, पछै अचानक फरमायो । हो सन्तां । आवै है सन्त-सत्यां जावो पुर-बार हो ।।
८८. मुहुरत बाद मुनी बेणोजी और कुशालोजी आया, बगतू, झूमा, डाही सतियां गुरु-दर्शन कर सुख पाया। हो सन्तां। जाणक उपज्यो है अवधिज्ञान उदार हो ।।
८९. पोढायां नै देर हुई तब संत बिठाया स्वामी नै, ध्यानासन में ध्यानलीन निज अन्तर-आत्मा नै चीन्है हो सन्तों। झिगमिगती तेरह-खंडी मंडी त्यार हो ।
९०. सुई खसोळी पगड़ी में सम्पूर्ण काम, दरजी बोल्यो, देर लखावै स्वामीजी रै, कहता ही अम्बर डोल्यो ।
हो सन्ता! साठे भादूड़ी तेरस मंगलवार हो ।
गावो गीत सुप्यार हो (भादुड़ी तेरस आई है)
९१. परम समाधी में स्वामीजी सात पोर रो संथारो, ‘सिरियारी री संत’ अंत तक देखायो चोथो आरो । हो सन्तों! उमड़ी है जनता, भक्तां री भरमार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (सिरियारी रो संत-) ।॥
९२. धम्मगिरी री पुण्य तलेटी तपस्विनी सरिता चर में, करै चरम संस्कार स्वाम रो, ओजस्वी ऊंचे स्वर में । हो सन्तां। धरणी-अंबर में जय-जय की धुंकार हो ।।
९३.दो’री लगी घणां नै पण जति हीरविजै दिलगीर बण्या, म्हारै प्रश्नां रो उत्तर अब कुण देसी? गंभीर बण्या ।
हो सन्ता। पूछ्यो निज इष्टदेव स्मृति में संभार हो ।।
९४. कहै देव ‘सीमन्धर-समवसरण’ स्यूं सीधो आयो हूं, स्वर्ग सिधारया भीखणजी विश्वस्त खबर मैं ल्यायो हूं।
हो सन्तों। पंचम स्वर्गाधिप वैभव रो अंबार हो । हो सन्तां। ‘शासन-प्रभाकर’ स्यूं म्है लियो उधार हो ।।
९५. घोर विरोधी भी बोलै वो सन्त अजब हो अलबेलो, सिद्धान्तां रो साथी, छोड्यो कदै नहीं अपणो गेलो ।
हो सन्तां । सहजोगी जुड्यो काफिलो जोरदार हो ।।
९६. उणपच्चास संत स्वामी-युग में छप्पन सतियां सारी, अट्ठारह सत्तरै गण बाहर, शेष रह्या संयमधारी ।
हो सन्तां। श्रद्धालू श्रावक संख्या शानदार हो ।।
९७. चम्मालीस बरस से पूरो स्वामीजी रो बरतारो, जिनशासन री आब बढ़ाई चमक्यो तेरापथ तारो ।
हो सन्तां । भव-भव में क्यूं कर भूलां ओ आभार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो शासन ओ स्वामीजी रो) ।।
९८. ॐ भिक्षु जय भिक्षु मंत्र ओ विघनहरण मंगलकारी, जन-मन रोचक, संकट मोचक सुखकारी भवभयकारी । हो सन्तों। गूंगो भी बोलै पंगू चढै पहाड़ हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (भिक्षु-भिक्षु भिक्षु म्हांरी ) ।।
९९. पुण्य-पोरसा स्वामीजी निज कर स्यूं जो विरवो रोप्यो, पडी-दर-पीडी सिंचन स्यूं बण शतशाखी हृद ओप्यो । हो सन्तों। मौसम-मौसम रा फळ, तरु छायादार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (स्वामी भीखणजी रो नाम ) ।।
१००. ‘भागी भारमल्ल’ गुरुवर रो आशीर्वर मूंघा-मोलो, रह्यो छत्र बण सिर पर आयो नहीं कहीं उन्हो झोलो । हो सन्तां! भारी पटधारी दीप्यो दिव्य दिदार हो ।।
१०१. उदयपुरी घटना में केसर-भंडारी रो चित्र बण्यो, भारिमाल-बरतारै अनुशासन रो वृत्त विचित्र बण्यो । हो सन्तां। भिक्षु साहित्य रा सुन्दर लिपिकार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (भारीमाल गणी) ।।
१०२. भारिमालजी री गादी पर रायऋषीजी राज करयो, ‘टाबर मनै न समझो कोई’ बैठ्या ही ओगाज करयो । हो सन्तां । चमक्या सूरज-सा भैक्षव-गण-गिगनार हो ।।
१०३. जनम लियो पहाड़ी भूमि पर? शेर गुफा में ही जनमै,
सिंह-वृत्ति स्यूं संयम पाळयो, मस्त रह्या अप णेपन में । हो सन्तां। जीवन जीयो बण ज्योतिर्मय अंगार हो ।।
१०४. स्वामीजी स्वर्गस्थ, जीत रो जनम, जुगल मरुधर-धोरी,
पंथ प्रगति पर रही एक सी सांवरियां री स्थिर थ्योरी ।
हो सन्तों! जन भाषा ‘श्री जय’ भीखण रा अवतार हो ।।
१०५.जयाचार्य अनिवार्य रूप शासन रो कायाकल्प करयो
, गढ्यो नयो इतिहास खास सार्थक स्वीकृत संकल्प करयो ।
हो सन्तां ! वज्रासन मुद्रा में जुड़तो दरबार हो ।। हो सन्तों! भैक्षव-वाड्मय रा भास्वर भाष्यकार हो ।।
१०६. महासती सरदारांजी री दीक्षा शिक्षा जय कर स्यूं, दियो विपुल सम्मान संघ में, नारी क्यूं है कम नर स्यूं ?
हो सन्तां । बन्धु-त्रिपुटी स्यूं होग्यो गण गुलजार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (जय हो कल्लू सुत) ।।
१०७.मघजी पुण्यवान है, म्हारै पंडित है, जय शब्द कह्या, अट्ठारै ग्यारै बरसां लग युवाचार्य आचार्य रह्या ।
हो सन्ता! निर्मल निर्मायी निश्छल निरहंकार हो ।।
१०८. भगिनी भाई दोनूं पाई कला सत्य संधान की, आत्म-विजेता नव नचिकेता वीतराग री बानगी ।
हो
सन्ता। जुग रा अजातशत्रु मघवा जगतार हो
१०९. जयपुर रो जौहरी है, कियो परीक्षण क्षण में जैगणी, लाला लिछमणजी स्यूं जाच्यो मूंघामोलो ओ मणी । हो सन्ता! भावी मघ-पटधारी माणक अणगार हो ।।
११०. अति विश्वास देव-ज्योतिष को हुवै अहितकर कम-बेसी, सक्रिय शिक्षण सदा संघ नै माणक युग देतो रेसी । हो सन्ता! शासन संभाळ्यो वर संवत्सर च्यार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (मघवा गादीधर म्हारा) ।।
१११. सप्तम पट-अधिकारी प्रभुताधारी डालिम देवता, तेजस्वी आचार्य आर्यजन दूर-दूर स्यूं सेवता ।
हो सन्ता। ओजस्वी वाणी, करता उग्र विहार हो ।।
११२. अपण पथ पर बढ़ो निरंतर पड़ो न खलता-खोड़ में, कहता डालिम – सोवो सुख भर सात हाथ री सोड़ में ।
हो सन्ता! छेड्या सहणी पड़सी फणधर-फुंकार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (निश दिन ध्याऊं मोद मनाऊं) ।।
११३. मघवा की-सी आकृति मघवा कृति मम जीवन ज्योति, करुणा री इकलौती मूरत, कालू काया कलधोती । हो सन्ता! संचित पुण्याई रो नहि आर-पार हो ।।
११४. दीक्षा में शिक्षा में, समय-समीक्षा में अगवाणी की, गण में बोया बीज प्रगति रा, जाणक भविष्यवाणी की । हो सन्तां। शास्ता-सो शासन, मात-पिता सो प्यार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (कालू कालू बोलूं-पृष्ट १३६) ।।
११५. आठ-पाट री सकल सम्पदा सूंपी मुझनै श्रीकालू, मैं मानूं म्हारी गतिविधि में सदा सहायक श्री कालू । हो सन्तां । युग नै परखण री दी दृष्टी दिलदार हो ।।
११६. महाप्रज्ञ-सा युवाचार्य सहयोगी है हर बात में, छाया बणकर रहै साथ निशि-वासर यातायात में । हो सन्ता! महाश्रमणी महाश्रमण सब साझीदार हो ।।
११७. श्री सरदार गुलाब नवलसति जेठां कानकुमारी है, झमकूजी लाडांजी कनकप्रभा केसर की क्यारी है। हो सन्तां । साध्वीप्रमुखा श्रमणीगण में श्रृंगार हो ।।
११८. मानवीय मूल्यां री जागरणा, जीवन रो सत्व है, नैतिकता संयुक्त धरम री व्याख्या अभिनव तत्त्व है। हो सन्तां । अणुव्रत-आचार संहिता अंगदकार हो ।।
११९. ध्यान घरम रो प्राणबीज हो, पतो नहीं क्यूं छूटग्यो ?अपणो रूप निहारै जिणमें, जाणक दर्पण टूट्ग्यो ।
हो सन्ता! प्रेक्षा तिण परम्परा से पुनरुद्धार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (आत्म साक्षात्कार प्रेक्षाध्यान) ।।
१२०. शिक्षा आज समस्या बणगी सबकी एक जबान है, समाधान आपां नै मिलग्यो जो जीवन-विज्ञान है। हो सन्तां । संस्कृति संरचना रो ओ सूत्रधार हो ।।
गावो गीत सुप्यार हो (विद्या के प्रांगण में) ।।
१२१. आगम-संपादन नै सारा सुधिजन शीश चढ़ायो है, नव युग रे चिन्तन से प्रतिनिधि सत् साहित्य सुहायो है। हो सन्तां ! प्रज्ञाचक्षु रा प्रेरक हृद्योद्गार हो ।।
१२२. कामधेनु है विश्वभारती, शिक्षण संस्था वरदाई, युग री मांग समण-श्रेणी है, आ पुरखां री पुण्याई । हो सन्तां । युनिवर्सिटि मान्य करी भारत सरकार हो ।।
जै. वि. भा. जानदार हो । समन्वित सात सकार हो ।।
हो सन्तां! भैक्षव शासन री सुषमा सौरभदार हो, हो सन्तां । तेरापथ परिधी में सारो संसार हो, बढ़ो ज्यूं देवदार हो, जुगोजुग जय जयकार हो ।। गावो गीत सुप्यार हो (शासन कल्पतरू ) ।।
लावणी
१२३.
आषाढी पूनम निशा धम्म-जागरणा, जागरणा तेरापंथ वृत्त वागरणा । शुरुआत हुई है योगक्षेम बरस में, सुंदर सुनियोजित वातावरण सरस में ।।
१२४. तिण हित ओ ‘तेरापंथ-प्रबोध’ रच्यो है,
स्वामीजी रै जीवन रो चित्र खच्यो है।
संवत सहस्त्र दो उणपच्चास प्रवर है,
आषाढ़ शुकल एकम अरु बुध वासर है ।।
सोरठा
१२५. अठहत्तर वय आज, ‘तुलसी’ गुरु-करुणा तरुण । तेरापंथ समाज, शुभ भविष्य है सामने ।।