(लयः मारूजी ! थांरै देश में ……)
स्वामीजी ! थांरी साधना री
स्वामीजी! थांरी साधना री मेरू-सी ऊंचाई । मेरू-सी ऊंचाई, है सागर-सी गहराई हो ।।
१. सिंह-सपन स्यूं आया माता, दीपां रै प्रांगण में,
सिंह-वृत्ति स्यूं ही उतस्या संयम रै समरांगण में,
मरुधर रा धोरी वीर जी, चाल्या बाधावां चीर जी,
कान खड्या होग्या दुनियां रा, बाजी जद शहनाई हो ।।
२. तन नै साध्यो मन नै साध्यो, और साध्य नै साध्यो, तपतै सूरज रो आतप लेतां, ओ हीरो लाध्यो,
सरिता-चर सुख री सेज जी, प्रकट्यो अन्तर से तेज जी,
गण री जड़ में खून पसीनै, री है खरी कमाई हो ।।
३. सूझबूझ रा धणी सांतरा, सत्य धर्म रा खोजी,
आज्ञा अनुशासन रा हामी, वीर प्रभू रा फोजी,
ननु-नच रो है के काम जी, चाहे सुबै हुवो या शाम जी, सिद्धान्तां रे खातिर करता, बाबै स्यूं भी डाई हो ।।
४. लाभ-अलाभ प्रशंसा-निन्दा, सुख-दुःख नै सम मान्यो, मुखड़े पर मुसकान अजब, अज्ञानी मुक्को ताण्यो,
आता रहता तूफान जी, छोड्यो कद अनुसंधान जी,
हिम्मत री कीमत चिन्ता री, पड़ी नहीं परछाई हो ।।
५. अन्तरंग बहिरंग घणी रोमांचक है घटनावां,
एक-एक स्यूं बढ़कर किसी-किसी कहकर बतलावा ? जुग जुग रहसी इतिहास जी, भरसी मन में उल्लास जी,
इं कलियुग में आ सतयुग-री झांकी-सी दिखलाई हो ।।
६. स्वर्ण कसौटी पर निखरै आ केबत बोत पुराणी,
जीवन स्यूं प्रत्यक्ष दिखाई श्वेत-संघ-सेनानी,
जाग्यो अन्तर विश्वास जी, टूट्या भक्तां रा पाश जी,
धीरै-धीरै अपणी गति स्यूं प्रगट हुई सच्चाई हो ।।
७. वीतराग रै वचनां पर ही जीवन सारो वास्यो,
रात-रात भर जाग-जाग कइयां रो भार उतास्यो,
बै अंकुर बण्या महान जी, फळवान हुयो उद्यान जी,
गगांशहर भिक्षु-चरमोत्सव ‘तुलसी’ गरिमा गाई हो ।।
रचयिता : आचार्यश्री तुलसी