वन्दना लो झेलो
वन्दना लो झेलो, भक्तां री भगवान ! अर्चना लो झेलो, भक्तां री भगवान ! धूप-दीप चंदन नहीं है, है श्रद्धा सम्मान ।।
मन-मन्दिर रा देवता! म्हारा प्रियतम ! जीवन प्राण ! पल-पल पूजा-आरती म्है करां समर्पण प्राण ।।
२. साचेला शंकर बण्या, कर धरती रो विष-पान । कळजुग में पिण राखली थे, जिन शासन री शान ।।
③. सदा कुरूढ्यां पर रह्या, थे ताण्यां तीर कबाण । 4 ‘ओ कुण काळो काबरो’, सुण छोड़ चल्या अन-पाण ।।
बुद्धि-प्रशंसा रूबरू, सुण करी टिप्पणी ताण । ‘कोरी बुध किण काम री’, सुण चमक्यो चतुर दिवाण ।।
५. भारिमाल अरु हेम नै, थे करता प्रथम निशाण । भारिमाल तेलो कस्यो, अरु हेम सही खरसाण ।।
रातीजोगा पिण दिया, जद जाण्यो जन-कल्याण । यूं खिण पिण खोता नहीं रे, समय मूल्य पहचाण ।।
७. पल में पर-मन परखता रे, ताव चढ़ी क्यूं ताण ।
तुरत दुराग्रह तोड़ता रे, निज प्रतिभा रै पाण ।।
८. कस्यो पसीनो खून रो, तज खान-पान रो ध्यान । धर्म कसौटी पर चढ्यो, ओ भिक्खण रो अहसान ।।
९. शाश्वत तथ्यां ऊपरै, थे कस्यो नयो निर्माण ।
चन्देरी चरमोत्सवे, है ‘तुलसी’ हर्ष महान ।।
लयः हरीगुण गायलै रे
रचयिता: आचार्यश्री तुलसी